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पृष्ठ:मनोविनोद.pdf/४७

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२६ मनोविनोद सतगुन समुद सुहास, समुद सरसावहि वन वन भारत भर, छके मद सनि सनि सारस सुआ मराल, बिहार रहे, वनि ठनि दल फल जल सुठि स्वाद, सस्य तृन नव नव खेतन खेचर भीर, चहकि रहीं कलरव विविध विहंगम गान, प्रकृत धुनि सुनि सुनि नव युव जन मन उमगत, रस लहि पुनि पुनि जल थल धरनि अकास, छई अब जो छवि सो सब अकथ अपार, सकहि कहि को कवि ऋतुवर ! सरद सुहावनि, स्वागत स्वागत ! तुअ हित मम हिय रह्यौ बहुरि अनुरागत (১১–১–१ ) गुनवन्त हेमन्त सरदी की अधिकार, सरद को अन्त है आयौ बहु गुनवन्त, सुऋतु हेमन्त है नव गेहूँ जब खेत, हरित छवि सोहनी सरसों सरस सुहात, दरस मन मोहनी सुघर सौंफ, सुन्दर कसूम क्यारी धनी उलहि रहीं रमनीक, नीक सोभा सनी मूरी, मटर, मलूक, फूल कोमल कलीं सरस साग सुठि स्वाद, मृदुल मोठी फलीं बरन बरन कृषि धरनि, लसत कुसुमावली CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri