३६ मनोविनोद शरद ऋतु वर्णन ( कालिदास के ऋतुसंहार से ) कांस के फूल दुकूल, खिले अरविन्दन में मुख सुन्दरताई । वोलन मत्त मरालन की कल नूपुर केरि करै समताई ॥ सोहत धान पकेन की पांति सोई पतरे तन की सुघराई । या विधि रूप सिंगार किये ऋतु सर्द नई दुलही सम आई ॥ कांसन सों धरनी को सरीर निसा नव निर्मल चन्द कलान सों। हंसन सों नदियांन की नीर तड़ाग कमोदन के कुनवान सों ॥ कानन के तट फूलन भार झुके १ छ्द सप्तन के बिरवान सों । सेत भए सब या ऋतु के गुन बाग चमेलिन की कलियान सों ॥ चञ्चल जो सफरी फरकैं मनु मञ्जुलसी कटि किं- किनि डोरी । सेत विहंगन की सुठि पंगति, राजतिसुन्दर हार सी गोरी ॥ तीर के देस विशाल नितम्ब सुमन्द प्रवाह भई गति थोरी । सोहति या ऋतु में सरिता, गजगामिनि कामिनि सी रस बोरी ॥ चांदी के पत्रन के सम ऊजरे, संख मृनाल से सु- १ सप्तच्छद वा सप्तपर्ण जिसे भाषा में कहीं २ सतबन्ना कहते हैं । CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri
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