मनोविनोद ४१ कास आज मन ललचावनी । बादर पलाने चन्दतारे छहराने या में सुखमा समूह सबै सुख सरसावनी ॥ कुमुद सङ्ग सों सीत सुभग सुठि बहति बयारी । जलद जाल सों छुटी दिसा दोसति अति प्यारी | मैल गयौ बिलगाय निपट उज्जल जल सोहत । शुष्क भई सब पङ्क स्वच्छ धरनी मन मोहत ॥ तिमि विमल किरन चय चन्द की चारु चांदनी जगमगत । उडुगन वि- चित्र चित्रित रुचिर, सरद व्योम सुन्दर लगत ॥ दिनकर किरनन को परास विकसत कक्ष प्रभात । सुन्दरीन के वदन सम सो सुन्दर दरसात ॥ त्यों छिपिगऐं मयङ्क के खिले कुमुद मुदि जात । जिमि पर देख गऐं पिया तिय मुख छवि कुम्हिलात || नैन स्याम सोभा सुभग नील कमल में देखि । कनक कौंधनी की झनक मत्त हंस रव पेखि ॥ प्रानप्रिया की अधर छवि बन्धुजीव में पाय । पथिक आज भ्रम में परचा रोवत अति अकुलाय ॥ सस अङ्क निकाई नई वनितान के उज्जल आनन मांहि बिहाई । कल हंस की बोलन प्यारी खरी मनि नूपुर बाजन में पधराई ॥ अरुनाई बँधूक के फूलन की अवलान के ओठन को पहराई । सरदागम सोभा स- लोनी सबै अति मञ्जुल औरहि ठौर सिधाई ॥ CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri
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