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पृष्ठ:मनोविनोद.pdf/५८

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मनोविनोद अञ्चल चञ्चलित रंग, झल मल झल मलित अंग, सुखमा तरलित तरंग, चारु हासिनी । मञ्जुल मनि बन्ध चोल, मौक्तिक लर हार लोल, लटकत लोलक अमोल, काम शासिनी । उन्नत अति उरज ऊप, बिलखत लखि विविध भूप, रति अवनति कर, अनूप, रूप रासिनी । नन्दन नन्दन विलास, बरसत आनन्द रासि, यूरप त्रय ताप नासि, हिय हुलासिनी । भारत सहि चिर वियोग आरत गत राग भोग, श्रीधर सुधि भेजि, तासु सोग नासिनी । भारतोत्थान भारत चेतहु नींद निवारो ( ९.९.८५ ) ક્ बीती निसा उदित भए दिन मनि, कब कौ भयो सकारी निरखहु यह सोभा प्रभात वर प्रभा भानु की अद्भुत किहि प्रकार क्रीड़ा कलोल मय विहग करहिं प्रातस्तुत विनस्यौ तम परिताप पाप सँग नभ नखत्र बिलगाने निसिचर खग भूचर तजि तजि सब भ्रमन, भये इक आने बिकसे कुमुद मधुर मारुत मदसने भौंर गुञ्जारत बाला नवल कमल कोमल वपु उठि निज केस सँवारत लगे सबै निज काज परस्पर, प्रेमपाग रस चाखन देखी बरति रह्यो आनँद सुख, उठी खोलि दोउ आंखन CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri