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पृष्ठ:मनोविनोद.pdf/६६

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मनोविनोद ५३ निवाहि जग, सब कौं प्रीति उछाह सिखायौ । हम हत भा- ग्य बाल विधवा तिय, लखि बसन्त हिय ज्वाल तपायौ ॥ मानमोचन ( ५.१.८५ ) ठाडे हरि द्वारे प्यारी, छांडो यह मान दरसन मिलन चाह चितवन के जाचक, छुधित समान राधा नाम रटत निसि वासर करत तिहारों ध्यान मानत तुम्हें आपनौ सरवस तन मन जीवन प्रान पहली प्रीति रीति जो राखी सो अपने जिय आन आदर देहु भेटि भुज श्रीधर हरि अपने प्रिय जान ( १०. ९.८५ ) फाग किंकिनि नूपुर धुनि अति सुहाय सोभा अनूप नहि वरनि जाय खेलत सखियन सँग कृष्ण फाग चाचरि गावत हरि विविध राग एक ओर कृष्ण, सब लखन संग दूजै राधा दल, अति उमंग अति मधुर बोल, अति मीठी तान गन्धर्व सुनत, चदि निज विमान CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri