मनोविनोद ५५ कर कटक चटक अनूप पट कटि सूत्र युत सम्पन्न पुनि चरन कमल निहारि नख नव जोति रवि छवि मन्द हंसि बाल रघुवर किलकि भूलत, परम आनँद कन्द महताब १ ध्यावति रूप तब अवधेस रघुकुल नाथ प्रभु दीन वन्धु दयाल श्रीधर निरखि नावहि माथ (१८८० ) भूलत रघुकुल राज दुलारे कञ्चन जटित अनेकन विद्रुम भूषन वसन हिंडोल संवारे ॥ भूमत मत्त घटादामिनि युत चञ्चल अनिल अधिक अंधियारे । मन्दिर महल विपुल सोभा छवि, दिनकर तुल्य दीप उजियारे ॥ विविध विहंग वाटिका कूजत, अति आनन्द मगन मतवारे । वनिता मिलि मलार कल गावें, नैन राम श्री मुखहि निहारे ॥ झूलत कुंवर अवध रानी कौ, देखौरी नव रूप दुलारे । पीवत हग भरि भरि जननी छवि, हृदय प्रेम पुनि पुनि पुचकारे ॥ भौंहे कुटिल डिठौना माथे, सुख में अल्प अंगूठा डारे । श्रीधर बाल पालने में ते उठि महताब कुंवरि उर आरे ॥ ( १८८० ) भूलत बाल तन रघुवीर अति सुघर हिंडोल सोहत चारु विलसत चीर रतन जटित अनूप डांड़ी लसत रेसम डोर हंसत किलकत मुदित है, प्रभु कोसलेस किसोर १ महताब कुंवार, कोटले की रानी के अर्थ बनाया गया । CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri
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