५६ मनोविनोद नवल तिय तहं तान गावें, परम आनँद लेहिं कमल लोचन निरखि पुनि पुनि विहँसि फोटा देहि सीस सोहत चौतनी, कर कटक जुगल अनूप कटि विराजत धौत पट, पद पैंजनिन कौ जूप कर्न कुंडल माल गल, अरु अलक अवलि मलूक निरखि छवि यह बाल पन की रह्यौ श्रीधर मूक राम विलाप - ( १८८० ) भैया लछमन हो ! सिया बिन दुख जीय अतिमृदुगात, तात ! कोमल कृश, प्राण पियारी सीय वुही कुटी, वुही लता भवन घन, बुही विटप, बुद्दी भूभि बुही दण्डकाsरन्य, मत्त जहं विहरत द्विप गन झूमि वुही सिला, बुही थल मृगया कौ, वुही सरित तट स्वच्छ वुही मत्त मधु कर मालति जहं, स्त्रवत लता अरु वृच्छ बिना विदेह नन्दिनी दरसन, लगत न एकहु अच्छ हिमकर किरन देखि दहकत तर्न, लक्ष्मन, यह मम लच्छ ! ( जून १८८१ ) सिय सुधि अबहु न पाई, एहो ! बरखा ऋतु बीतिगई विमल अकास प्रकासित चन्दा, नभ नूतन छवि छई सूखे पन्थ, कास वन फूले, नलिनी विकसित भई स्रोता, सरित, स्वतट है आए, निर्मल सर छबि नई CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri
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