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पृष्ठ:मनोविनोद.pdf/७०

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मनोविनोद ५७ खञ्जन चपल दियौ अञ्जन हग, रवि सोभा अधिकई नृपदल चले नृपन के देसन, तिन प्रति जुद्धै ठई हम कायर सिय मिलन जतन की, अजहुं न चिन्ता भई स्वांति बूंद जल चातक पायो तृषा तासु बुझि गई लीलाधर १ हम निपट अभागे मन दुख दहकत दई । ( जूलाई, १८८१ ) गोपिकागीत २‍ कियौ कृष्ण जब बन गमन गोपी भई विहाल कहि कहि लीला कृष्ण की दुख करि काट्यौ काल कहति परस्पर मिलि सबै बिरह व्यथित नव बाम कलन परति उन बिन सखी कष्ट देत अति काम वाम भुजा पै वाम गंड ३ भृकुटी करि बांकी अधर मुरलिया धरी अमित सोभा छवि जाकी मृदु अंगुरिनु करि मुरलिया जबै बजावत स्याम सिद्ध यक्ष गंधर्व त्रिय इक सँग होति सकाम स्याम विन कैसे जीओ आलि हृदय विराजत हार कंठ राजत बनमाला लीने त्रिभुवन मोहि कान्ह दीनन प्रतिपाला १ पं० श्रीधर पाठक के पूज्य पाद पिता - जिन्की प्रसन्नतार्थ यह पर रचा गया । २ भागवत से । ३ गंड = कपोल । CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri