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६० मनोविनोद गौ लावत आवत सखी ब्रजजन सुख निश्शेष स्याम बिन कैसें जीओ आलि रतनारे अति नैन मैन मद खंडन हारी बदन पांडु मृदु गंड कर्न कुंडल युग धारी ग्वाल बाल सँग स्याम जब लावत गौअनु आपु उदित निशामुख चन्द सम हरत सकल दिन तापु स्याम बिन कैसे जीओ आलि ऐसे श्री ब्रजराज गुण गावति नव व्रजवाल काल बितावति सो भई हिरदै धरि नँदलाल यह गाथा गोपीन की प्रेम भरी गंभीर लीलाधर १ आनंद भयौ पढ़त सुनत जिमि कीर [ ३१.५. ४१ ] १ पं० श्रीधर पाठक के पूज्यपाद पिता जिनकी प्रसन्नतार्थ लिखा गया । CCO, Gurukul Kangri Collection, Haridwar, Digitized by eGangotri