पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/२६

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कहानी की मज्जागत विशेषता नहीं है, इसलिए उस युग के परिप्रेक्ष्य में डॉ॰ सिंह ने १/२ पेज (एक टोकरी भर मिट्टी) के स्थान पर 'प्रणयिनी-परिणय' को प्रस्तुत किया।

सन् १९०० के संदर्भ में डॉ॰ सिंह के विचार देखिए––"कहानी और उपन्यास में, ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय तक कोई ऐसा अलगाव नहीं हो पाया था कि उसके बीच कोई विभाजन-रेखा खींची जा सके।"

इसे यदि आप स्वीकार कर लें तो कम-से-कम सैकड़ों उपन्यासों को हिन्दी साहित्य के इतिहास से ग़ायब कर देना पड़ेगा। जबकि वास्तविकता यह है कि डॉ॰ बच्चन सिंह कहानी और उपन्यास के बीच आज भी कोई विभाजन-रेखा ठीक से नहीं खींच पा रहे हैं। परन्तु, हमारे पूर्वज उसका अंतर अच्छी तरह समझते थे और यही कारण था कि किशोरीलाल गोस्वामी ने अपने मासिक का नाम 'उपन्यास' रखा था। साथ ही अपने ६५ उपन्यासों को उपन्यास कहा है। उन्होंने 'इन्दुमती' को कहानी और 'प्रणयिनी-परिणय' को उपन्यास घोषित किया था, क्योंकि दोनों के बीच विभाजन-रेखा स्पष्ट थी। क्या डॉ॰ सिंह १८८२ में लाला श्रीनिवासदास-कृत 'परीक्षागुरु', जो हिन्दी का प्रथम उपन्यास माना गया है, को नकार सकते हैं। मैं यहाँ स्थानाभाव के कारण लेखकों के मात्र नाम का स्मरण दिलाना चाहूँगा। शायद, इससे वे अपनी मान्यता बदल दें––बालकृष्ण भट्ट, लज्जाराम, राधाकृष्ण दास, देवकीनंदन खत्री, गहमरी, आदि-आदि। ठाकुर जगमोहन सिंह ने (सन् १८८८) में अपने उपन्यास 'श्यामा-स्वप्न' के मुखपृष्ठ पर यह छपवाया था––"An Original Novel in Hindi Prose"––गद्य में एक मौलिक उपन्यास। क्या इतना पढ़कर भी यदि हम कहानी और उपन्यास का अंतर न स्वीकारें तो इसे विशाल हठवादिता के सिवाय और क्या कहा जायेगा? इस तथ्य को हम कैसे भूल जाएँ कि तत्कालीन उपन्यासकारों ने हिन्दी के पाठकों की वृद्धि में कितना अमूल्य योगदान किया है। डॉ॰ सिंह ने