पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/३०

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(३२)

एते सन्ति गुणाः प्रवासविषये दोषोऽस्ति चैको महान्
यन्मुग्धामधुराधराधरसुधापानं विना स्थीयते।

तीर्थों का अवलोकन, सर्वत्र परिचय, द्रव्य-संपादन, अनेकानेक आश्चर्य पदार्थों का निरीक्षण, बुद्धि-चातुर्य और सुन्दर भाषा––इतने सब गुण प्रवास में हैं। परन्तु उसमें एक बड़ा भारी दोष भी है कि मुग्धांगना के मधुर अधर का अमृत-प्राशन किये बिना रहना पड़ता है।

(४)

सब लोग कंजूस की निन्दा करते हैं। कहते हैं कि जमीन में तिजोरी गाड़कर उस पर पलंग बिछाकर वह रात्रि के समय अकेला ही सोया करता है। भार्या का संग नहीं करता। कारण यह है कि न जाने कदाचित् लड़के-बच्चे हो जायँ और फिर उसके वित्त का हरण कर लें। परन्तु एक कवि ऐसी उत्प्रेक्षा करता है कि नहीं––

कृपणेन समो दाता न भूतो न भविष्यति।
अस्पृशन्नेव वित्तानि यः परेभ्यः प्रयच्छति॥

कृपण के समान दाता न तो आज तक कभी हुआ है और न आगे होगा। दूसरे लोग तो दान देते समय द्रव्य का स्पर्श भी करते हैं, परन्तु कृपण स्वकीय द्रव्य को बिना छुए ही दे देता है (अर्थात् मत्यु के अनन्तर)।

(५)

अहं च त्वं च राजेन्द्र लोकनाथावुभावपि।
बहुब्रीहिरहं राजन् षष्ठीतत्पुरुषो भवान्॥

एक दिन एक विद्वान महाशय राजा की सभा में गये। कहने लगे कि––हे राजेन्द्र, आप और हम दोनों ही लोकनाथ हैं। फरक इतना ही है कि आप श्रीमान हैं और मैं याचक हूँ––अतएव याचक होने के कारण मेरे नाम में 'लोकनाथ' बहुब्रीहि समास है, जैसे––लोक है नाथ जिसके, वह लोकनाथ और आपके नाम में 'लोकनाथ' षष्ठी तत्पुरुष समास है, जैसे––लोकों का नाथ, लोकनाथ। उक्त महाशय का बुद्धि-चातुर्य देख राजा बहुत प्रसन्न हुए और उनकी योग्य संभावना की।