पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/३५

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(३८)

इस अपूर्व शोभा और चमत्कार को देख वह श्रान्त पथिक बिलकुल विस्मित हो गया। उसकी दृष्टि झर-झर बहते हुए उस समीपवर्ती जलधारा की ओर एकटक लग गई। मन में कुछ गंभीर विचार भी आने लगे। इतने में जिधर उसका घोड़ा चर रहा था, उस तरफ से पत्तों की खरखराहट उसके कान पर पड़ते ही वह चौंक उठा। ज्योंही वह उधर देखता है, त्योंही एक दीर्घ भयंकर गर्जना सुन पड़ी। पलक मारने की देर थी कि उस बटोही ने अपने घोड़े को एक बड़े सिंह के पंजे से घायल होकर जमीन पर गिरते देखा। फिर क्या! क्रोध से लाल होकर खड़ा हो गया और हाथ में तलवार लेकर सिंह के पिछले पैर पर ऐसे जोर से वार किया कि वह कट गया। इतने में दूसरे पैर पर भी एक घाव लगाकर उसको पूरा लँगड़ा ही कर डाला। सिंह घायल होकर, थोड़े कर्कश स्वर में गर्जता हुआ दूर हट गया। परन्तु उसके पंजे की चोट इतनी जबरदस्त लग गई थी कि वह बेचारा घोड़ा अंत समय की वेदना से तड़फड़ाने लगा। अपनी शिकार खो गई और लँगड़ा भी होना पड़ा, इस बात का खेद मानकर सिंह ने अपनी आँखें अंगार के समान लाल कीं, आयाल के बाल खड़े कर दिये और पूँछ पटककर अति घोर गर्जना करता हुआ अगले पैरों से सरकते-सरकते अपने शत्रु पर टूटने के लिए आगे बढ़ने लगा। इतने में उस वीर पुरुष ने तलवार का ऐसा एक हाथ चलाया कि सिंह का मस्तक उसके धड़ से बिलकुल अलग हो गया।

घोड़े की मृत्यु देखते ही बटोही अत्यन्त दुःखित हुआ। एक जानवर साथ में था, वह भी चला गया। अब पैरों के बल प्रवास करना पड़ेगा, इस बात की चिंता से उसका मन बहुत उदास हो गया।

कुछ देर में जब उसका मन शांत हुआ तो अपना सामान उठाकर जंगल में चलने लगा। थोड़ी दूर तक जाने के पश्चात् जंगल खतम हुआ और खुला मैदान दीख पड़ा। वहाँ उसने एक हरिणी को अपने बच्चे