पृष्ठ:माधवराव सप्रे की कहानियाँ.djvu/४४

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"सच है ये मेरे हाथ बँधे हैं, इसीलिए तुम इतनी, बड़-बड़ कर रहे हो। कायरों का तो यह काम ही है कि जब शत्रु के भय से दूर हों तो शूर-वीर बन जायें। अरे दुष्ट, अधम, परद्रव्यापहारी नीच! क्या जख्मी और पराधीन को दुर्वचन कहने ही में तू अपनी बहादुरी समझता है?"

यह सुनकर उस चोर को कुछ लज्जा उत्पन्न हुई। उसने कहा––

"अच्छा शौर्य और सच्चाई किसे कहते हैं, हम नहीं जानते। इसके लिए तकरार करने से कुछ फायदा नहीं। लेकिन आज इतने दिन से तुम हमारे यहाँ हो, तुमको खिलाने-पिलाने और दवा-दारू करने में जो हमारा पैसा लगा है, वह तो मिलना ही चाहिए। तुम्हारे पास तो एक कौड़ी भी नहीं। इसलिए हमारा विचार है कि तुमको गुलाम बनाकर बेच दें और पैसे वसूल कर लें।"

फिर वे चोर उस पथिक को एक नजदीक के गाँव में ले गए। वहाँ किसी व्यापारी के पास बेचकर जो कुछ कीमत मिली, लेकर घर लौट आए। व्यापारी ने उसके घाव पर मल्हम-पट्टी वगैरह लगाई और अच्छे-अच्छे पौष्टिक पदार्थ खाने को दिए। उसका पूर्व वृत्तान्त पूँछकर अच्छी तरह से हिफाजत की। पथिक अपने मन में समझ गया कि उसकी इतनी फिकर क्यों हो रही है। अब एक दिन अवश्य ही गुलाम बनना पड़ेगा। क्या करे बेचारा! निरुपाय होकर ईश्वर पर भरोसा रखकर बड़ी कठिनाई से दिन बिताने लगा। जब कभी स्वप्न की याद आ जाती, तो अत्यन्त व्याकुल और उदास हो जाता। स्वप्न में दूत के वचन पर विश्वास रखकर आज तक जितना मनोराज्य किया, उसके विषय में अब उसको बहुत ही शरम मालूम होती थी। स्वप्न-जैसी मिथ्या कल्पना इतनी सत्य प्रतीत हुई––इस बात का उसे बड़ा आश्चर्य हुआ, और अब जो कुछ नसीब में