पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१२७

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दण्ड संध्या का समय था। कचहरी उठ गई थी। अइसकार और चपरासो जे खनखनाते घर जा रहे थे । मेहतर कूड़े टटोल रहा था कि शायद कहीं पैसे-वैसे मिल जायें । छचहरी के बरामदों में साड़ी में बकीलों को जगह ले ली थी। पेड़ों के नीचे मुहरिरों की जगह कुत्ते धैठे नजर आते थे। इसी समय एक बूढ़ा आदमी, फटे-पुराने कपड़े पहने, लाठी टेकता हुआ, जर साइब के बंगले पर पहुंचा और सायवान में खड़ा हो गया। जट साहब का नाम था मिस्टर जो० सिनहा । अरदलो ने दर हो से ललकारा-कौन सायबान में खड़ा है ? क्या चाहता है? बूढ़ा-यशेष बाम्हन हूँ भैया, साहब से भेंट होगी ? अरदशी-साहब तुम जैसों से नहीं मिला करते । बूढ़े ने लाठो पर अकड़कर कहा-क्यों भाई, हम सहे हैं, या डाकू-चोर हैं, कि हमारे मुँह में कुछ लगा हुआ है ? अदनी-भीख मांगकर मुक्कदमा लड्ने आये होगे ? बूढ़ा--तो कोई पाप किया है ? अगर घर बेचकर मुकदमा नहीं लाते तो कुछ बुरा करते हैं ? यहाँ तो मुकदमा लड़ते-लड़ते उन षोत गई, लेकिन घर का पैसा जहाँ खरचा । मियाँ को जूतो मियों के सिर करते हैं। दस भलेमानसों से मांगकर एक को दे दिया। चलो छुट्टी हुई। गाँव-भर नाम से कांपता है। किसी ने पारा भी टिर-पिर की और मैंने अदालत में दावा दायर किया। मरदली-किसी बड़े आदमी से पाला नहीं पड़ा अभी । बूढ़ा-अजी, कितने ही पड़ों को बड़े पर भिजवा दिया, तुम हो किस फेर में । हाई कोर्ट तक जाता हूँ सीधा । कोई मेरे मुंह क्या आयेगा बेचारा ! गाँठ से तो कोदी जाती नहीं, फिर डरें क्यों ? जिसको जिस चीज़ पर दात लगाये, अपना करके छोड़ा। सीधे से न दिया तो अदालत में घसीट लाये और रगेद-गेदकर मारा, अपना क्या बिगड़ता है । तो बाहर से इत्तला करते हो कि मैं ही पुका? भरदली ने देखा, यह आदमी यो टलनेवाला नहीं, तो भाकर साहब से उसकी इत्तला की । साहब ने हुलिया पूछा और खुश होकर कहा-फौरन वुला नो । ,