पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१३०

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A आप यहाँ उसका आधा पूरा कर दीजिए, तो एक ही पेशो में वारा-न्यारा हो जाय ! आधी रकम बच जाय। सत्यदेव ने १० गिन्नियां और निकालकर मेज पर रख दी और घमढ के साथ बोले-हुक्म हो तो राना साहब से कह दें, आप इत्मीनान रखें, साहब को कृपा- दृष्टि हो गई है। मिस्टर सिनहा ने तीन स्वर में कहा--जी नहीं, यह कहने की भारत नहीं । मैं किसी शर्त पर यह रकम नहीं ले रहा हूँ। मैं करूँगा वही जो कानून की मंशा होगी। कानून के खिलाफ जो भर भी नहीं जा सकता । यही मेरा उसूल है। आप लोग मेरी खातिर करते हैं, यह आपको शराफ़त है। मैं उसे अपना दुश्मन समझूगा जो मेरा ईमान खरीदना चाहे । मैं जो कुछ लेता हूँ, सच्चाई का इनाम समझकर लेता हूँ। ( २ ) जगत पाड़े को पूरा विश्वास था कि मेरी जीत होगी, लेकिन तजवीज़ सुनी तो होश उड़ गये । दावा खारिज हो गया। उस पर खर्च को चपत अलग । मेरे साथ यह चाल ! अगर लाला साहब को इसका मजा न चखा दिया तो बाम्हन नहीं। हैं किस फेर में ? सारा शेव भुला दूंगा । यहाँ गाढ़ी कमाई के रुपये हैं। कौन पचा सकता है ? हाड़ फोड़ फोड़कर निकलेंगे। इसो द्वार पर सिर पटक-पटककर मर जाऊँगा। उसी दिन सध्या को जगत पांडे ने मिस्टर सिनहा के जंगले के सामने आपन जमा दिया । वहाँ बरगद का एक घना वृक्ष था। मुकदमेवाले वहीं सत्तू-चबेना खाते और दोपहरी उसो को छाँह में काटते थे। जगत पड़ेि उनसे मिस्टर सिनहा को दिळ खोलकर निन्दा करता। न कुछ खाता, न पोता, पस लोगों को अपनो राम कहानी सुनाया करता । जो सुनता बह जट साहब को चार खोटो-खरो कहता -आदमी नहीं, पिशाच है, इसे तो ऐसी जगह मारे जहाँ पानी न मिले। रुपये के रुपये लिये, ऊपर से खरचे समेत डिप्रो कर दो। यही करना था तो रुपये काहे को निगले थे? यह है हमारे भाई-बन्दों का हाल। यह अपने सहलाते हैं। इनसे तो अगरेज हो अच्छे । इस तरह की मालोचनाएँ दिन-भर हुआ करतो । जगत पाहे के पात्र आठों पहर जमघट लगा रहता। इस तरह चार दिन बीत गये और मिस्टर सिनहा के कानों में सी बात पहुंची।