पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२१३

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V . पैरों पड़ता था, मगर रायसाहब का क्रोध शान्त होने का नाम न लेता था। सब नौकर जमा हो गये और नथुदा के जले पर नमक छिड़कने लगे। रायसाहव का क्रोध और भी बढ़ा । हन्टर हाथ से फेंककर ठोकरों से मारने लगे। रत्ना ने यह रोना सुना तो दौड़ी हुई आई और यह समाचार सुनकर बोली-दादाजो, बेचारा मर जायगा, अप इस पर दया कीजिए। रायसाहप-मर जायगा, उठवाकर फेंक दूंगा। इस इदमाशो का मजा तो मिक नायगा। रत्ना-मेरी ही चारपाई थी न, मैं उसे क्षमा करती हूँ। रायसाहब-जरा देखो तो अपनी चारपाई को गत । पाजो के बदन को मैल भर गई होगी। भला, इमे सूत्री क्या ? क्यों बे, तुझे सम्झी क्या ? यह कहकर रायसाहब फिर लपके ; मगर नथुवा आकर रत्ना के पीछे दबक गया। इसके सिवा और कहीं शरण न थी । रत्ना ने रोकर कहा-दादाजी, मेरे कहने से अब इसका अपराध क्षमा कीजिए। रायसाइज-क्या कहती हो रत्ना, ऐसे अपराधी कहीं क्षमा किये जाते हैं। खैर, तुम्हारे कहने से छोड़ देता हूँ, नहीं तो भाज जान लेकर छोड़ता ! सुना बे मथुवा, अपना भला चाहता है तो फिर यहाँ न आना, इसी दम निकल जा, सुअर, नालायक ! नथुवा प्राणे छोड़कर भागा। पीछे फिरकर भी न देखा। सड़क पर पहुँचकर वह खसा हो गया। यहां रायसाहब उसका कुछ नहीं कर सकते थे। यहां सब लोग उनकी मुँह-देखी तो न कहेंगे। कोई तो कहेगा कि लड़का था, भूल सी हो गई तो क्या प्राण ले लीजियेगा । यहाँ मारें तो देखू, गाली देकर भागा, फिर कौन मुझे पा सकता है । इस विचार से उसकी हिम्मत बंधी । बंगले की तरफ मुंह करके जोर से बोग-यहाँ,आओ तो देखें, और फिर भागा कि कहीं रायसाहब ने सुन न लिया हो। ( २ ) नथुवा थोड़ी ही दूर गया था कि रत्ना की मेमसाहमा अपने टमटम पर सवार भाती हुई दिखाई दी। उसने समझा, शायद मुझे पकड़ने आ रही हैं। फिर भागा, किन्तु जब पैरों में दौड़ने की शक्ति न रही तो खड़ा हो गया। उसके मन ने कहा, वह मेरा क्या कर लंगो, मैंने उनका कुछ बिगाड़ा है। एक क्षण में मेजवाहवा भा: पहुँचों और टमटम रोककर बोली-नाथ, कहाँ जा रहे हो ?