पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


नरक का मार्ग २३ करने को जी नहीं चाहता ; कदाचित् शत्रु को भी देखकर किसी का मन इतना क्लांत न होता होगा। उनके आने के समय दिल में धड़कन-सी होने लगती है। दो-एक 'दिन के लिए कहीं चले जाते हैं तो दिल पर से एक मोम्म-सा उठ जाता है ; हसती भी हूँ, बोलती भी हूँ, जीवन में कुछ आनन्द आने लगता है, लेकिन उनके आने का समाचार पाते ही फिर चारों ओर अंधकार ! चित्त को ऐसी दशा क्यों है, यह मैं नहीं कह सकती। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि पूर्व जन्म में हम दोनों में पैर था, उसो वैर का बदला लेने के लिए इन्होंने मुझसे विवाह किया है, वही पुराने सस्कार हमारे मन में बने हुए हैं। नहीं तो वह मुझे देख-देखकर क्यों जलते और मैं उनकी सूरत से क्यों घृणा करती। विवाह करने का तो यह मतलब नहीं हुआ करता ! मैं अपने घर इससे कहीं सुखी थी। कदाचित् मैं जीवन-पर्यन्त अपने घर आनन्द से रह सकती थे। लेकिन इस लोक-प्रया का बुरा हो, जो अभागिनी कन्याओं को किसी न किसी पुरुष के गले बाँध देना अनिवार्य समझता है । वह क्या जानता है कि कितनी युवतियां उसके नाम को रो रही हैं, कितने अभिलाषाओं से लहराते हुए, कोमल हृदय उसके पैरों तले रौंदे जा रहे हैं। युवती के लिए पति कैसी- कैसी मधुर कल्पनाओं का स्रोत होता है, पुरुष में जो उत्तम है, श्रेष्ठ है, दर्शनीय है, उसको सजीव मूर्ति इस शब्द के ध्यान में आते ही उसकी नज़रों के सामने आकर खड़ी हो जाती है। लेकिन मेरे लिए यह शब्द क्या है ? हृदय में उठनेवाला शुल, कलेजे में खटकनेवाला कोटा, आँखों में गड़नेवालो किरकिरी, अतःकरण को बेधने- वाला व्यग्य-धाण ! सुशीला को हमेशा हंसते देखती हूँ। वह कभी अपनी दरिद्रता का गिला नहीं करती, गहने नहीं हैं, कपड़े नहीं हैं, भाड़े के नन्हें-से मकान में रहती है, अपने हाथों घर का सारा काम-काज करती है, फिर भी उसे रोते नहीं देखती। अगर अपने वश की बात होती तो आज अपने धन को उसकी दरिद्रता से बदल लेती। अपने पति-देव को मुसकिराते हुए घर में आते देखकर उसका सारा दुःख-दारिद्रय छ-मतर हो जाता है, छाती गज़-भर को हो जाती है। उसके प्रेमालिंगन में वह सुख है, जिस पर तीनों लोक का धन न्योछावर कर दें। ( ३ ) आज मुझसे जन्त न हो सका। मैंने पूछा-तुमने मुझसे किसलिए विवाह क्या था ? यह प्रश्न महीनों से मेरे मन में उठता था, पर मन को रोकती चली आती 3