पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२९४

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भाड़े का उद्र का हकोम बना दिया । पहले मुवक्किलों का पक्ष लेकर अदालत से लड़ा, फिर छात्रों का पक्ष लेकर प्रिंसिपल से रार मोल लो, और अब प्रना का पक्ष लेकर सरकार को चुनौती दी । वह स्वभाव हो से निर्भीक, आदर्शवादी, सत्यभक्त तथा आत्माभिमानी था। ऐसे प्राणी के लिए प्रजा-सेवक बनने के सिवा ओर उपाय हो क्या था । समा- चारपत्रों में वर्तमान परिस्थिति पर उसके लेख निकलने लगे। उपको आलोचनाएँ इतनो स्पष्ट, इतनी व्यापक और इतनी मार्मिक होती थी कि शीघ्र हो उसको कीर्ति फैल गई। लोग मान गये कि इस क्षेत्र में एक नई शक्ति का उदय हुआ है । अधि- कारी लोग उसके लेख पढ़कर तिलमिला उठते थे। उसका निशाना इतना ठीक बैठता था कि उससे बच निकलना असंभव था। अतिशयोकिया तो उनके सिरों पर से सन- सनाती हुई निकल जाती थी। उनका वे दर से तमाशा देख सकते थे ; अभिज्ञताओं को वे उपेक्षा कर सकते थे। ये सब शस्त्र उनके पास तक पहुंचते हो न थे, रास्ते हो में गिर पड़ते थे। पर रमेश के निशाने ठोक सिरे पर बैठते और अधिकारियों में हलचल और हाहाकार मचा देते थे। देवा की राजनीतिक स्थिति चिंताजनक हो रही थी। यशवंत अपने पुराने मित्र के लेखों को पढ़-पढ़कर कांप उठते थे । भय होता, कहों वह कानून के पजे में न आ जाय। बार-बार उसे सयत रहने की ताकीद करते, बार-बार मिन्नतें करते कि जरा अपने कलम को और नरम कर दो, जान-बूझकर क्यों विषधर कानून के मुंह में उँगली डालते हो? लेडिन रमेश को नेतृत्व का नशा चढ़ा हुआ था। वह इन पत्रों का जवाब तक न देता था। पांचवें साल यशवत बदलकर आगरे का शिला-मज हो गया। (8) देश की राजनीतिक दशा चिन्ताजनक हो रही थी। खुफिया पुलोस ने एक तूफान खड़ा कर दिया था । उसको कपोल-हरिपत कथाएँ सुन-सुन कर हुक्कामों को रूह झना हो रही थी। कहीं अखगारों का मुंह बन्द किया जाता था, कहाँ प्रजा के नेताओं डा। खुफिया पुलीस ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए हुकार्मों के कुछ इस तरह फान मरे कि उन्हें हरएक स्वतन्त्र विचार रखनेवाला भादमी खूनी और कातिल नकर भाता था। रमेश यह अन्धेर देखकर चुप रहनेवाला मनुष्य न था। ज्यों-ज्यों अधिकारियों