पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/३०३

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सहसा स्त्री ने पूछा-आप क्या जवाब देते हैं। यशवंत-मैं पल जवाब दूंगा। जरा सोच लूं ? स्त्रो-नहीं, मुझे इतनी फुरसत नहीं है। अगर आपको कुछ उलमान हो तो साफ-साफ कह देजिए, मैं और प्रबन्ध करू। यशवंत को और विचार करने का अवसर न मिला। जल्दी का फैसला स्वार्थ हो को और झुस्ता है। यहाँ हानि की सम्भावना नहीं रहतो । यशवंत-आप कुछ रुपये पेशगी दे सकती हैं ? स्त्रो-रुपयों को मुमसे भार-बार चरचा न कीजिए । उनको जान के सामने रुपयों की हस्ती क्या है । आप जितनी रकम चाई, मुम्भ ले लें। आप चाहे उन्हें छुजन सके, लेकिन सरकार के दांत जरूर खट्टे कर दें। यशवंत-खैर, मैं ही वकील हो जाऊँगा। कुछ पुरानी दोस्ती का निर्वाह भो तो करना चाहिए। ( १०) पुलीस ने एँ को-चोटी का जोर लगाया, सैकड़ों शहादतें पेश की। मुखबिर ने तो पूरी गाथा हो सुना की; लेकिन यशवत ने कुछ ऐसी दलीलें की, शहादतों को कुछ इस तरह झूठा सिद्ध किया, और सुखबिर की कुछ ऐसी खबर लो कि रमेश बेदाग छूट गये। उन पर कोई अपराध न सिद्ध हो सका। यशवंत जैसे संयत और विचारशील वकील का उनके पक्ष में खड़े हो जाना हो इसका प्रमाण था कि सरकार ने गलतो को। सध्या का समय था । रमेश के द्वार पर शामियाना तना हुआ था। गरीबों को भोजन कराया जा रहा था। मित्रों को दावत हो रही थी। यह रमेश के छूटने का उत्सव था। यशवत को चारों ओर से धन्यवाद मिल रहे थे । रमेश को बधाइयाँ दो जा रही थी । यशवत बार-बार रमेश से बोलना चाहता था, लेकिन रमेश उसकी भोर से मुँह फेर लेते थे। अब तक उन दोनों में एक बात भी न हुई थी। आखिर यशवत ने एक बार हुँ मलाकर कहा-तुम तो मुझसे इस तरह ऐंठे हुए हो, मानों मैंने तुम्हारे साथ कोई नुराई की है। रमेश-और आप क्या समझते हैं कि मेरे साथ भलाई को है ? पहले आपने मेरे इस लोक का सर्वनाश किया था, अबकी परलोक का किया । पहले न्याय किया होता, तो मेरी ज़िन्दगी सुधर जाती और अब जेल जाने देते, तो आकरत बन जातो।'