पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/३२१

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." सिंहिनी की भांति गरजकर बोलो-यू ब्लाढो,'हट जा रास्ते से, नहीं तो अभो पुलोष को बुलाती हूँ । रास्केल ! पण्डितजी चाटा खाकर चौंधिया गये। आंखों के सामने अँधेरा छा गया । मान- सिक आघात पर यह शारीरिक वज्रपात ! यह दुहरी विपत्ति ! वह तो चांटा मारकर हवा हो गहै, और यह वही जमीन पर बैठकर इस सम्पूर्ण वृत्तान्त को मन-ही-मन भालोचना करने लगे। चाटे ने बाहर की आँखें आंसुओं से भर दो थी, पर अन्दर को आँखें खोल दो थीं। कहाँ कालेज के लौंडी ने तो यह शरारत नहीं की ? अवश्य यहो बात है । आह ! पाजियों ने बड़ा चकमा दिया ! तभो सब के-सब मुझे देख देख- कर हँसा करते थे ! मैं भी कुछ कमअश्ल हूँ, नहीं तो इनके हाथों टेसू क्यों बनता ! वदा झांसा दिया। उम्र भर याद रहेगा। वहाँ से झल्लाये हुए भाये और नईम से बोले-तुम बड़े दगाबाज हो, परले सिरे के धूर्त, पाजो, उल्लू, गधे. शेतान ! नईम~आखिर कोई बात तो कहिए, या गालियां ही देते जाइएगा? गिरिधर :-क्या बात हुई, कहाँ लूसो से मापने कुछ कहा तो नहीं ? चक्रधर-उसी के पास से आ रहा हूँ चाटा खाकर, और मुंह में कालिय लगवाकर । तुम दोनों ने मिलकर मुझे खूप उल्लू बनाया । इसकी कसर ना तो मेरा नाम नहीं । मैं नहीं जानता था कि तुम लोग मित्र बनकर मेरी गरदन पर छुरी चला रहे हो ! अच्छा, जो वह गुस्से में आकर पिस्तौल चला देतो, तो ? नईम-अरे यार, माशूर्को को घातें निरालो होती हैं ! चक्रधर-तुम्हारा सिर ! माशूक चाटे लगाया करते हैं। वे आँखों से तोर चलाते हैं, कठार मारते हैं, या हाथों से मुष्टि-प्रहार करते हैं ? गिरिधर-उससे आपने क्या कहा ? चक्रधर-कहा क्या, अपनी विरह-व्यपा की गाथा सुनाता रहा । इस पर उसने ऐसा चाटा रसोद किया कि कान भन्ना बठे। हाथ हैं उसके कि पत्थर ! गिरिधर-राजा ही हो गया। आप हैं निरे चौच । आदमों, इतनी मोटो बुद्धि है तुम्हारी । हम क्या जानते थे कि आप ऐसे छिछोरे हैं, नहीं तो मज़ाक हो क्यों करते । अब आपके साथ हम लोगों पर भो आफत आई। कहो उसने प्रिसिपल से शिकायत कर दी, तो न इधर के हुए, न उधर के। और जो कहीं अपने किसो अंगरेज़ आशना से कहा, तो बान के लाले पड़ जामगे ; बड़े बेवकूफ हो यार, निरे