पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/७८

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स्वग का दवा क्या लीला-तुम राग-रग मनाते हो, मैं तुम्हें मना तो नहीं करतो! मैं रोतो हूँ तो क्यों नहीं रोने देते ? सोतासरन-मेरा घर रोने के लिए नहीं है। लोला-अच्छी बात है, तुम्हारे घर में न रोऊँगी। ( ५ ) लीला ने देखा, मेरे स्वामी मेरे हाथों से निकले जा रहे हैं। उन पर विषय का भूत सवार हो गया है और कोई समन्वानेवाला नहीं। वह अपने होश में नहीं है। मैं क्या करूँ । अगर मैं चली जाती हूँ तो थोड़े हो दिनों में सारा घर मिट्टी में मिल जायगा और इनका वही हाल होगा जो स्वार्थी मित्रों के चंगुल में फंसे हुए नौजवान रईसों का होता है। कोई फुलटा घर में आ जायगी और इनका सर्वनाश कर देगी। ईश्वर ! मैं ? अगर इन्हें कोई बीमारी हो जाती तो क्या मैं उस दशा में इन्हें छोड़कर चली जाती ? कभी नहीं । मैं तन-मन से इनको सेवा शुश्रूषा करती, रेश्वर से प्रार्थना करती, देवताओं की मनौतियां करती। माना, इन्हें शारीरिक रोग नहीं है, लेकिन मानसिक रोग अवश्य है । जो आदमी रोने की जगह हँसे और हँसने की जगह रोये, उसके दीवाना होने में क्या सदेह है ! मेरे चले जाने से इनका सर्व नाश हो जायगा। इन्हें बचाना मेरा धर्म है। हाँ, मुझे अपना शोक भूल जाना होगा । रोऊँगो-रोना तो मेरी तकदौर में लिखा ही है-रोऊँगी, लेकिन हँस-हंसकर । अपने भाग्य से लहूँगी । जो जाते रहे उनके नाम को रोने के सिवा और कर हो क्या सकतो हूँ, लेकिन जो है उसे न जाने दंगी आ ऐ टूटे हुए हृदय ! आज तेरे टुकड़ों को जमा करके एक समाधि बनाऊँ और अपने शोक को उसके हवाले कर दें। ओ रोनेवालो आँखें, आओ और में आंसुओं को अपनी विहसित छठा में छिपा लो । आओ मेरे आभूषणों, मैंने बहुत दिन तक तुम्हारा अपमान किया, मेरा अपराध क्षमा करो, तुम मेरे भले दिनों के साथी हो तुमने मेरे साथ बहुत विहार किये हैं, अब इस संकट में मेरा साथ दो ; मगर देखो दणा न करना, मेरे मेदों को छिपाये रखना 1,L- लीला सारी रात बैठो अपने मन से यही बातें करती रही। उधर मदने । धमा चौकड़ी मनी हुई थी। सीतासरन नशे में चूर, कभी गाता था, कभी तालिम 1 .n