पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/९०

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एक आंच की कसर है। यह मेरे सिद्धान्त के विरुद्ध है, पर करूँ क्या, बच्चे की अम्म जान नहीं मानता। कोई अपने बाप पर फेडता है, कोई और किसी खर्राट पर । चौथे-अजी, कितने तो ऐसे बेहया है जो साफ-साफ कह देते हैं कि हमने लाके की शिक्षा-दीक्षा में जितना खर्च किया है वह हमें मिलना चाहिए । मानों उन्होंने यह रुपये किसो बैंक में जमा किये थे। पांचवे-खूब समक रहा हूँ, आप लोग मुम्क पर छोटे उड़ा रहे हैं । इसमें लश्केवालों का ही सारा दोष है या लड़कीवाले का भो झुछ है ? पहले-लड़कीवाले का क्या दोष है, सिवा इसके कि वह लड़की का बाप है ? दूसरे-सारा दोष ३३वर का है जिसने लड़कियां पैदा कों। क्यों ? पांचवें-मैं यह नहीं कहता। न सारा दोष लगीवाले का है, न सारा दोष लसवाले का। दोनों ही दोषी हैं। मगर लड़कोवाला कुछ न दे तो उसे यह शिकायत करने का तो कोई अधिकार नहीं है कि बाल क्यों नहीं लाये, सुन्दर जोड़े क्यों नहीं बाये, वाजे-गाजे और धूमधाम के साथ क्यों नहीं आये ? बताइए चौथे ही, आपका यह प्रश्न गौर करने के लायक है । मेरो समझ में तो ऐसी दशा में लड़के के पिता से यह शिकायत न होनी चाहिए । पांचवें-तो यो कहिए कि दहेज को प्रथा के साथ ही डाल, पहने और जोड़ों पडी प्रथा भो त्याज्य है। केवल दहेज को मिटाने का प्रयत्न करना व्यर्थ है। यशोदानन्द 1-~-यह भी lame excuse' है । मैंने दहेज नहीं लिया है, लेकिन पया डाल-गहने न ले जाऊँगा? पहले - महाशय, आपको घात निराली है । आप अपनी गिनतो हम दुनियावालों के साथ क्यों करते हैं ? आपका स्थान तो देवताओं के साथ है। दुसरे-२० इज़ार को रक्कम छोड़ दो ! क्या बात है। यशोदानन्द-मेरा तो यह निश्चय है कि हमें सदैव principles२ पर स्थिर रहना चाहिए । principles के सामने money की छोई value नहीं है । दहेज को कुप्रथा पर मैंने खुद कोई व्याख्यान नहीं दिया, शायद कोई नौट तक नहीं लिखा। हाँ, conference६ में इस प्रस्ताव को second का चुका हूँ १-योथी दलोल । २ -सिद्धान्तों। ३-सिद्धान्त । ४-धन । ५--मूल्य । ६-सभा । ७-अनुमोदन ।