१२० मानसरोवर कोलेज जाते समय श्रद्धा उस नवयुवक को खोई हुई आँखो से खोजती । घर पररोज़ चिक की श्राड़ से, रास्ते के आते-जाते लोगो को देखती; लेकिन वह नवयुवक नज़र न आता। कुछ दिनो बाद महिला-मंडल की दूसरी सभा का विज्ञापन निकला। अभी सभा होने को चार दिन बाकी थे। यह चारो दिन श्रद्धा ने अपना भाषण तैयार करने मे बिताये। एक-एक शब्द की खोज में घटों सिर मारती । एक-एक वाक्य को बार-बार पढ़ती। बड़े-बड़े नेताअो की स्पीचे पढ़ती और उसी तरह लिखने की कोशिश करती | जब सारी स्पीच पूरी हो' गई, तो श्रद्धा अपने कमरे में जाकर कुरसियों और मेजो को सबोधित करके ज़ोर-ज़ोर पढ़ने लगी। भाषणकला के सभी लक्षण जमा हो गये थे। उपसंहार तो इतना सुंदर था कि उसे अपने ही मुख से सुनकर वह मुग्ध हो गई। इसमें कितना संगीत था, कितना पाकर्षण, कितनी क्राति ! सभा का दिन आ पहुंचा। श्रद्धा मन-ही-मन भयभीत होती हुई सभा- मंडप में घुसी । हॉल भरा हुआ था और पहले दिन से भी अधिक भीड़ थी। श्रद्धा को देखते ही जनता ने तालियां पीटकर उसका स्वागत किया। कोला- हल होने लगा, और सभी एक स्वर में चिल्ला उठे-आप अपनी वक्तृता शुरू करे। श्रद्धा ने मंच पर आकर एक उड़ती हुई निगाह से जनता की ओर देखा । वह काला नवयुवक जगह न मिलने के कारण, अतिम पक्ति में खड़ा हुआ था। श्रद्धा के दिल मे गुदगुदी सी होने लगी। उसने कांपते हुए स्वर मे अपनी वक्त ता शुरू की। उसकी नज़रों मे सारा हाल पुतलियों से भरा हुआ था ; अगर कोई जीवित मनुष्य था, तो वही सबसे पीछे खड़ा हुआ काला नवयुवक | उसका मुख उसी की ओर था। वह उसी से अपने भाषण की दाद मांग रही थी। हीरा परखने की आशा जौहरी से ही की जाती है। अाध घंटे तक श्रद्धा के मुख से फूलों की वर्षा होती रही। तोगों को बहुत कम ऐसी वक्तृता सुनने को मिली थी। ( ४ ) श्रद्धा जब सभा समाप्त होने पर घर चली, तो देखा, वहीं काला नव-
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