पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२५०

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२४६ मानसरोवर स्त्री क्या थी, मिट्टी का लोंदा थी। एक पैसे की ज़रूरत होती तो सास से मांगती।', साराश यह कि दोनों स्त्रियां अपने अधिकारों से बेखवर, अन्धकार में पढ़ी हुई पशुवत् जीवन व्यतीत करती थीं। ऐसी फूहड़ थीं कि रोटियाँ भी अपने हाथ से बना लेती थीं । कजूसी के मारे दालमोट, समोसे कभी बाज़ार से न मॅगातीं। आगरेवाले की टूकान की चीजें खाई होतीं, तो उनका मज़ा जानतीं । बुढ़िया खूसट दवा-दरपन भी जानती थी । बैठी-बैठी घास-पात कूटा करती। मुंशीजी ने मां के पास जाकर कहा- अम्माँ ! अब क्या होगा ? भानुकुवरि ने मुझे जवाब दे दिया ! माता ने घबराकर पूछा-जवाब दे दिया ? मुशी-हाँ, विलकुल बेक़सूर ! माता-क्या बात हुई ? भानुकुंवरि का मिज़ाज तो ऐसा न था। मुशी-बात कुछ न थी। मैंने अपने नाम से जो गाँव लिया था, उसे मैंने अपने अधिकार में कर लिया। कल मुझसे और उनसे साफ-साफ बातें हुई । मैंने कह दिया कि वह गांव मेरा है । मैंने अपने नाम से लिया है। उसमें तुम्हारा कोई इजारा नहीं। बस, बिगड़ गई , जो मुंह में आया, बकती रहीं । उसी वक्त मुझे निकाल दिया और धमकाकर कहा-मैं तुमसे लड़कर अपना गांव ले लूंगी। अब आज ही उनकी तरफ से मेरे ऊपर मुकदमा दायर होगा ; मगर इससे होता क्या है ? गाँव मेरा है। उसपर मेरा कब्जा है । एक नहीं, हजार मुकदमे चलायें, डिगरी मेरी होगी। माता ने बहू की तरफ़ मर्मान्तक दृष्टि से देखा और बोली-क्यों भैया ! वह गांव लिया तो था तुमने उन्हींके रुपये से और उन्हींके वास्ते ? मुंशी-लिया था, तब लिया था। अब मुझसे ऐसा आवाद और मालदार गांव नहीं छोड़ा जाता। वह मेरा कुछ नहीं कर सकतीं। मुझसे अपना रुपया भी नहीं ले सकती । डेढ़-सौ गांव तो हैं । तब भी हवस नहीं मानती। माता-बेटा, किसीके धन ज्यादा होता है, तो वह उसे फेंक थोड़े ही देता है। तुमने अपनी नीयत बिगाड़ी, यह अच्छा काम नहीं किया । दुनिया तुम्हें क्या कहेगी ? और दुनिया चाहे कहे या न कहे, तुमको भला ऐसा चाहिए कि जिसकी गोद में इतने दिन पले, जिसका इतने दिनों तक नमक खाया, अब उसी से दगा करो ? नारायण ने तुम्हें क्या नहीं दिया ? मजे से खाते हो, पहनते हो, घर में नारायण का दिया चार । .