पृष्ठ:मानसरोवर १.pdf/१४२

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घरजमाई

एक दिन उसने मुना, गुमानी ने दुसरा पर कर लिया । माँ से बोला --- तुमने सुना काकी ! गुमानी ने घर कर लिया।

काकी ने कहा --- घर क्या कर लेगो, ठट्ठा है ! बिरादरी में ऐसा अन्धेर ? पंचायत नहीं, अदालत तो है ?

हरिधन ने कहा --- नहीं काकी, बहुत अच्छा हुआ। का, महाबीरजी को लड्डू चढ़ा आऊ। मैं तो डर रहा था, कहीं मेरे गले न आ पड़े। भगवान् ने मेरी सुन ली। मैं वहाँ से यही ठानकर चला था, अब उसका मुँह न देखूँगा।




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