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गुल्ली डण्डा

गया ने कहा --- आप तो अंधेरा हो गया है भैया, कल पर रखो।

मैंने सोचा, कल बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदाये ; इसलिए इसी वक्त मुआमला साफ़ कर लेना अच्छा होगा।

'नहीं, नहीं। अभी बहुत उजाला है। तुम अपना दांव ले लो।'

'गुल्लो सूझगो नहीं।'

'कुछ परवाह नहीं।'

गया ने पदाना शुरू किया , पर उसे अब बिलकुल अभ्यास न था। उसने यो वार टाड़ लगाने का इरादा किया ; पर दोनों ही पार हुच गया। एक मिनिट से कम में वह अपना दांव पूरा कर चुका। बेचारा घंटा-भर पादा; पर एक मिनिट हो में अपना दाव खो बैठा। मैंने अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया।

'एक दाँव और खेल लो। तुम तो पहले ही हाथ मे हुच गये।'

'नहीं भैया, अब अँधेरा हो गया।'

'तुम्हारा अभ्यास छूट गया। क्या कभी खेलते नहीं ?

'खेलने का समय कहाँ मिलता है भैया!'

हम दोनों मोटर पर जा बैठे और चिरारा जलते-जलते पड़ाव पर पहुंच गये। गया चलते-चलते बोला-कल यहाँ गुल्ली-डण्डा होगा। सभी पुराने खिलाडो खेलेंगे। तुम भी आओगे ? जब तुम्हें फुरसत हो, तभी खिलाड़ियों को बुलाऊँ।

मैंने शाम का समय दिया और दूसरे दिन मैच देखने गया। कोई दस-दस भादमियों को मण्डली थी ; कई मेरे लड़कपन के साथी निकले। अधिकाश युवक थे, जिन्हे मैं पहचान न सका। खेल शुरू हुआ। मैं मोटर पर बैठा-बैठा तमाशा देखने लगा। आज गया का खेल, उसका वह नैपुण्य देखकर मैं चकित हो गया ! ठौड़ लगाता, तो गुल्ली आसमान से बातें करती। कल की-सी चह किमक वह हिचकिचा- हट, वह बेदिली आज न थी। लड़कपन में जो बात थी, आज उसने प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। कहीं कल इसने मुझे इस तरह पदाया होता, तो मैं कर रोने लगता। उसके डण्डे की चोट खाकर गल्ली दो सौ राज को खबर लाती थी।

पदनेवालों में एक युवक ने कुछ धांधली की। उसने अपने विचार में गुल्ली लोक ली थी। गया का कहना था --- गुल्ली ज़मीन में लगकर उछली थी। इस पर दोनों में ताल ठोंकने की नौबत आई । युवक दब गया। गया का तमतमाया हुआ चेहरा देख-