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कायर


मालूम हुआ कि तुम जैसी विदुषियाँ भी उनकी पूजा करती हैं। अब मैं तुम्हारे संमार को छोड़ने पर तैयार हूँ, तो मैं तुमसे भी यही आशा करता हूँ।'

प्रेमा ने मन में सोचा, मेरा अपनी देह पर क्या अधिकार है। जिस माता-पिता ने अपने एक से मेरी सृष्टि की है, और अपने स्नेह से उसे पाला है, उनकी मरजी के खिलाफ कोई काम करने का उसे कोई हक नहीं।

उसने दीनता के साथ केशव से कहा --- क्या प्रेम स्त्री और पुरुष के रूप ही में रह सकता है, मैत्री के रूप में नहीं ? मैं तो प्रेम को आत्मा का बन्धन समझती हूँ।

केशव ने कठोर भाव से कहा --- इन दार्शनिक विचारों से तुम मुझे पागल कर दोगी, प्रेमा। वह इतना ही समझ लो कि मैं निराश होकर जिन्दा नहीं रह सकता। मैं प्रत्यक्षवादी हूँ, और कल्पनाओं के संसार में प्रत्यक्ष का आनन्द उठाना मेरे लिए असम्भव है।

यह कहकर, उसने प्रेमा का हाथ पकड़कर, अपनी ओर खींचने की चेष्टा को प्रेमा ने झटके से हाथ छुड़ा लिया और बोली --- नहीं केशव, मैं कह चुकी हूँ कि मैं . स्वतन्त्र नहीं हूँ। तुम मुझसे वह चीज़ न मांगी, जिन पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।

केशव को अगर प्रेमा ने कठोर शब्द कहे होते, तो भी उसे इतना दुःख न हुआ होता। एक क्षण तक वह मन मारे बैठा रहा, फिर उठकर निराशा-भरे स्वर में - बोला --- जैसी तुम्हारी इच्छा' और आहिस्ता-आहिस्ता कदम उठाता हुआ वहाँ से चला गया। प्रेमा अब भी वहीं बैठो आँसू पहातो रहो।

( २ )

रात को भोजन करके प्रेमा जब अपनी मां के साथ लेटो, तो उसकी आँखों में नींद न थी। केशव ने उसे एक ऐसी बात कह दो यो, जो चचल पानी में पड़नेवाली छाया की तरह उसके दिल पर छाई हुई। प्रतिक्षण उसका रूप बदलता था। वह उसे स्थिर न कर सकती थी। माता से इस विषय में कुछ कहे तो कसे ? लज्जा मुंह. बन्द कर देती थी। उसने सोचा, अगर केशव के साथ मेरा विवाह न हुआ तो मेरे लिए संसार में फिर क्या रह जायगा, लेकिन मेरा बस ही क्या है। इन भौति- भांति के विचारों में एक बात जो उसके मन में निश्चित हुई, वह यह थी कि केशव के सिवा वह और किसी से विवाह न करेगी ?