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मानसरोवर


प्रेमा यह बखान सुनकर लट्ट हो जायगी। यह जवाब सुनकर तीखे स्वर में बोले --- तू तो ऐसी बातें कर रही है, जैसे तेरे लिए धन और अधिकार का कोई मूल्य ही नहीं।

प्रेमा ने ढिठाई से कहा --- हाँ, मैं तो इसका मूल्य नहीं समझतो ; मैं तो आदमी में त्याग देखती हूँ। मैं ऐसे युवकों को जानती हूँ, जिन्हें यह पद जबरदस्ती भी दिया जाय, तो स्वीकार न करेंगे।

पिता ने उपहास के ढग से कहा --- यह तो आज मैंने नई बात सुनौः। मैं तो देखता हूँ कि छोटी-छोटी नौकरियों के लिए लोग मारे-मारे फिरते हैं। मैं जरा उस लड़के को सूरत देखना चाहता हूँ, जिसमें इतना त्याग हो। मैं तो उसकी पूजा करूँगा।

शायद किसी दूसरे अवसर पर ये शब्द सुनकर प्रेमा लज्जा से सिर झुका लेती; पर इस समय की दशा उस सिपाही की-सी थी, जिसके पीछे गहरी खाई हो। आगे मढ़ने के सिवा उसके लिए और कोई मार्ग न था। अपने भावेश को संयम से दबातो हुई, अखिों में निद्रोह भरे, वह अपने कमरे में गई, और केशव के कई चित्रों में से यह एचित्र चुनकर लाई, जो उसकी निगाह में सबसे खराब था, और पिता के सामने रख दिया ! बूढे पिताजी ने चित्र को उपेक्षा के भाव से देखना चाहा, लेकिन पहली ही दृष्टि में उसने उन्हें आकर्षित कर लिया; ऊँचा कद था, और दुर्बल होने पर भी उसका सगठन, स्वास्थ्य और संयम का परिचय दे रहा था। मुख पर प्रतिभा का तेज न था; पर विचारशीलता का कुछ ऐसा प्रतिबिम्ब था, जो उसके प्रति मन में विश्वास पैदा करता था।

उन्होंने उस चित्र को और देखते हुए पूछा --- यह किसका चित्र है ?

प्रेमा ने सकोच से सिर झुकाकर कहा --- यह मेरे ही क्लास में पढते हैं।

'अपनी ही बिरादरी का है ?'

प्रेमा की मुखमुद्रा धूमिल हो गई। इसी प्रश्न के उत्तर पर उसकी किस्मत का फैसला हो जायगा। उसके मन में पछतावा हुआ कि व्यर्थ में इस चित्र को यहां लाई। उसमें एक क्षण के लिए जो दृढ़ता आई थी, वह इस पैने प्रश्न के सामने कातर हो उठी। दबी हुई आराज़ में बोला ---'जी नहीं, वह ब्राह्मण हैं।' और यह काने के साथ ही वह क्षुब्ध होकर कमरे से निकल गई, मानों वहाँ की वायु में उसका गला धुटा जा रहा हो, और दीवार की खाई में खड़ी होकर रोने लगो।

लालाजी का तो पहले ऐसा क्रोध आया कि प्रेमा को बुलाकर साफ-साफ कह