पृष्ठ:मानसरोवर १.pdf/२२६

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शिकार

फटे वस्त्रोंवाली मुनिया ने रानी वसुधा के चाँद-से मुखड़े को और सम्मानभरी आंखों से देखकर राजकुमार को गोद में उठाते हुए कहा-हम गरीबों का इस तरह कैसे निबाह हो सकता है महारानी ! मेरो तो अपने आदमी से एक दिन न पटे। मैं उसे घर में पैठने न दें। ऐसी-ऐसी गालियां सुनाऊँ कि छठी का दूध याद आ जाय।

रानी वसुधा ने गम्भीर बिनोद के भाव से कहा --- क्या, वह कहेगा नहीं, तू मेरे बीच में बोलनेवाली कौन है ? मेरो जो इच्छा होगी वह करूंगा। तू अपना रोटी- कपड़ा मुझसे लिया कर। तुझे मेरी दूसरी बातों से क्या मतलब ? मैं तेरा गुलाम नही हूँ।

मुनिया तीन हो दिन से यहां लड़कों को खिलाने के लिए नौकर हुई थी। पहले दो-चार घरों में चौका-बरतन कर चुको थो; पर रानियों से अदव के साथ बातें करना कभी न सोख पाई थी। उसका सूखा हुआ सांवला चेहरा उत्तेजित हो उठा। कर्कश स्वर में बोली --- जिस दिन ऐसो वार्ते मुंह से निकालेगा, मूंछे उखाड़ लूंगी ! सरकार ! वह मेरा गुलाम नहीं है, तो क्या मैं उसकी लौंडी हूँ ? आर वह मेरा गुलाम है, तो मैं उसकी लौंडी हूँ। मैं आप नहीं खातो, उठे खिला देती हूँ; क्योंकि वह मर्द-बचा है, पल्लेदारी में उसे बहुत कसाला करना पड़ता है। आप चाहे फटे पहन , पर उसे फटे-पुराने नहीं पहनने देती। जब मैं उसके लिए इतना करती हूँ, तो मजाल है, कि वह तुझे आँख दिखाये। अपने घर को आदमी इसीलिए तो छाता-छोपता है, कि उससे बर्खा-वूँदों में बचाव हो। अगर यह डर लगा रहे, कि घर न जाने कब गिर पड़ेगा, तो ऐसे घर में कौन रहेगा। उससे तो रूख की छाँह कहाँ अच्छी। कल न जाने कहाँ बैठा गाता-बजाता रहा। दस बजे रात को घर आया। मैं रात भर उससे बोली ही नहीं। लगा पैरों पड़ने, विधियाने, तब मुझे दया आ गई। यही मुझमें एक बुराई है। मुझसे उसको रोनी सूरत नहीं देखो जाती। इसो से वह कभी-कभी बहक जाता है , पर अब मैं पक्की हो गई हूँ। फिर किसी दिन मगड़ा किया, तो या हो रहेगा, या मैं ही रहूंगी। क्यों कियो को धौंस सहूं सरकार। जो बैठकर खाय, वह धौंस सहे ! यहाँ तो बराबर की कमाई करती हूँ।