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मानसरोवर

वसुधा ने उसी गम्भीर-भाव से फिर पूछा --- अगर वह तुझे बैठकर खिलाता तब तो उसको धौंस सहतो ?

मुनिया जैसे लड़ने पर उतारू हो गई। बोली --- बैठाकर कोई क्या खिलायेगा सरकार ? मर्द बाहर काम करता है, तो हम भी घर में काम करती हैं कि घर के काम में कुछ लगता ही नहीं। बाहर के काम से तो रात को छुट्टी मिल जाती है। घर के काम से तो रात को भी छुट्टी, नहीं मिरती। पुरुष यह चाहे कि मुझे घर में ठकर आफ्, सैर-सपाटा करे, तो मुमसे तो न सहा जाय । --- यह कहती हुई मुनिया राजकुमार को लिये हुए बाहर चली गई।

वसुधा ने थकी हुई, रुआंसी आँखों से खिड़की की ओर देखा। बाहर हरा-भरा पाय था, जिसके रंग-विरगे फूल यहाँ से साफ़ नज़र आ रहे थे, और पीछे एक विशाल मन्दिर आकाश में अपना सुनहला मस्तक उठाये, सूर्य से आखें मिला रहा था। स्त्रियाँ रंग-बिरंगे वस्त्राभूषण पहने पूजन करने आ रही थीं। मन्दिर के दाहिनी तरफ तालाब में कमल प्रभात के सुनहले आनन्द से मुसकिरा रहे थे। और कार्तिक की शीतक रवि-छवि जीवन ज्योति लुटाती थी, पर प्रकृति को यह सुरम्य शोभा वसुधा को कोई हर्ष न प्रदान कर सकी। उसे जान पड़ा --- प्रकृति उसकी दशा पर व्यग्य से मुसकिरा रही है। उसो सरोवर के तट पर केवट का एक टूटा फूटा झोपड़ा किसी अभागिनी वृद्धा की, भाँति रो रहा था। वसुधा की आँखें सजल हो गई। पुष्प और उन्माद के मध्य में खड़ा वह सूना झोपड़ा सबके विलास और ऐश्वर्य से घिरे हुए मन का सजीव चिन था। उसके जी में आया, जाहर झोपड़े के गले लिपट जाऊँ और खूब रोऊँ।

वसुधा को इस घर में आये पांच वर्ष हो गये। पहले उसने अपने भाग्य को सराहा था। माता-पिता के छोटे-से, वच्चे आनन्दहीन घर को छोड़कर, वह एक विशाल भवन में आई थी, जहाँ सम्पत्ति उसके पैरों को चूमती हुई जान पड़ती थी। उस समय सम्पत्ति ही उसकी आँखों में सब कुछ थी। पत्ति-प्रेम गौण-सौ वस्तु थी पर उसका लोभी मन सम्पत्ति पर सन्तुष्ट न रह सका। पति-प्रेम के लिए हाथ फैलने लगा। कुछ दिनों उसे मालम हुआ, मुझे पद-रन भी मिल गया , पर थोड़े ही दिनों में यह भ्रम माता रहा। कुँअर गजराजसिह रूपवान थे, उदार थे, शिक्षित थे, विनोद प्रिय थे और रेम का अभिनय करना जानते थे, बल्वान थे, पर उनके जीवन में प्रेम से कपित होने वाला तार न था। वसुधा का हिला हुमा यौवन और देवताओं को भी