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मानसरोवर

'उन दोनों साहकों के पास हमेशा मोटरें भेजी जाती रही हैं। इसलिए मैंने भेज दी। अब भाप हुक्म दे रही है, तो मँगवा लूंगा।'

वसुधा ने फोन से आकर सफर का सामान ठीक करना शुरू किया। उसने उसी आवेश में भाकर अपने भाग्य-निर्णय करने का निश्चय कर लिया था। परित्यक्ता की भांति पड़ो रहकर वह जीवन को समाप्त करना चाहती थी। वह जाकर कुभर साहब से कहेगी-अगर आप यह समझते हैं कि मैं आपको सम्पत्ति की लौंडी बनकर रहूँ, तो यह मुझसे न होगा। आपकी संपत्ति भापको मुबारक हो ! मेरा अधिकार आपको संपत्ति पर नहीं, आपके ऊपर है; अगर आप मुझसे जो भर हटना चाहते हैं, तो मैं आपसे हाथ भर हट जाऊँगी। इस तरह की और कितनी विराग-भरी बातें उसके मन में बगूलों की भांति उठ रही थीं।

डाक्टर साहब ने द्वार पर पुकारा ---

वसुधा ने नम्रता से कहा --- आज क्षमा कीजिए, मैं जरा पोलीभीत जा रही हूँ।

डाक्टर ने आश्चर्य से कहा --- आप पोलीभीत जा रही हैं। आपका ज्वर बढ़ जायगा। इस दशा में मैं आपको जाने की सलाह न दूंगा।

वसुधा ने विरक्त-स्मर में कहा --- बढ़ जायगा, बढ़ बाय; मुझे इसकी चिन्ता नहीं है।

वृद्ध डाक्टर परदा उठाकर अन्दर आ गया और वसुधा के चेहरे को और ताकता हुमा बोला-लाइए मैं टेम्परेचर ले लूँ ; अगर टेम्परेचर बढ़ा होगा, तो मैं आपको हरगिज़ न जाने दंगा।

'टेम्परेचर लेने की प्ररूरत नहीं। मेरा इरादा पक्का हो गया है।'

'स्वास्थ्य पर ध्यान रखना आपका पहला कर्तव्य है।'

वसुधा ने मुसकिराकर कहा --- आप निश्चिन्त रहिए. मैं इतनी जल्द मरी नहीं जा रही है। फिर भगा किसी बीमारी की दवा मौत ही हो, तो आप क्या करेंगे।

डाक्टर ने दो-एक बार और आग्रह किया। फिर विस्मय से सिर हिलाता चला गया।

( २ )

रेलगाड़ी से जाने में आखिरी स्टेशन से दस कोस तक जंगलो सुनसान रास्ता तय करना पड़ता था इसलिए कुँअर साहब बराबर मोटर हो पर जाते थे। वसुधा ने