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शिकार


भी उसी मार्ग से जाने का निश्चय किया था। दस बजते-बजते दोनों मोटरें आई। वसुधा ने ड्राइवरों पर गुस्सा उतारा --- अब अगर मेरे हुक्म के बगैर कहों मोटर ले गये तो मोटर का किराया तुम्हारी तलब से काट लूंगी। अच्छो दिल्लगो है ! घर को रोयें, मन को खायें। इमने अपने आराम के लिए मोटरें रखी हैं, किसी की खुशामद करने के लिए नहीं। जिसे मोटर पर सवार होने का शौक हो, मोटर खरीदे, यह नहीं, कि हलवाई की दुकान देखी और दादे का फातिहा पढ़ने बैठ गये।

वह चली तो दोनों बच्चे कनमनाये ; मगर जब मालूम हुआ. कि अम्मा बड़ो दूर हौवा को मारने जा रही है, तो उनका यात्रा प्रेम ठण्डा पड़ा। वसुधा ने आज सुबह से उन्हें प्यार न किया था। उसने जलन में सोचा~मैं ही क्यों इन्हें प्यार करूँ, क्या मैंने ही इनका ठेका लिया है। वह तो वह भाकर वन करें और मैं यहां इन्हें छाती से लगाये बैठी रहूँ लेकिन चलते समय माता का हृदय पुलक उठा। दोनों को बारी-बारी से गोद में लिया, चूमा, प्यार किया और घंटे-भर में लौट भाने का वचन देकर वह सजल नेत्रों के साथ घर से निकली। मार्ग में भी उसे बच्चों को याद बार-बार आती रही। रास्ते में कोई गांव आ जाता, और छोटे-छोटे बालक मोटर को दौड़ देखने के लिए घरों से निकल आते, और सड़क पर खड़े होकर तालियां बजाते हुए मोटर का स्वागत करते, तो वसुधा का जो चाहता, इन्हें गोद में उठाकर प्यार कर लूँ। मोटर मितने वेग से आगे जा रही थी, उतने ही वेग से उसका मन सामने के वृक्ष-समूहों के साथ पीछे को और उदा जा रहा था। कई बार इच्छा हुई, घर लौट चलूँ। जब उन्हे मेरी रत्ती भर परवाह नहीं है, तो मैं ही क्यों उनकी फिक्र में प्राण दूँ ? जी चाहे आवे, या न आवे , लेकिन एक बार पति से मिलकर उनसे खरी-खरी बात करने के प्रलोभन को वह न रोक सकी। सारी देह थक कर चूर-चूर हो रही थी, ज्वर भी हो आया था, सिर पीड़ा से फटा पड़ता था, पर वह सकल्प से सारी बाधाओं को दवाये आगे बढ़ती जाती थी। यहां तक कि अब वह दस बजे रात को जगल के उस टाक-अंगले में पहुँची, तो उसे तन बदन को सुधि न थी। जोर का ज्वर चढ़ा हुआ था।


( ३ )

शोफर को आवाज़ सुनते ही कुँअर साहब निकल आये और पूछा --- तुम यहाँ कैसे आये भो ? कुशल तो है ?