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शिकार


समझे कि वसुधा ने सिहद्वार से प्रवेश न पाकर चोर दरवालो से घुसने का प्रयत्न किया है। जाकर वह चीजें उठवा लाये ; लेकिन आदमियों को परदे की आड़ में खड़ा करके पहले अकेले ही उसके पास गये। डरते थे, कहीं मेरी उत्सुकता वसुधा को बुरी न लगे।

वसुधा ने उत्सुक होकर पूछा --- चीज़ नहीं लाये ?

'लाया हूँ; मगर कही डाक्टर साहब नाराज न हो।'

'डाक्टर ने पढ़ने-लिखने को मना किया था।'

तोहफे. लाये गये। कुँअर साहब एक एक चीज़ निकालकर दिखाने लगे। वसुधा के चेहरे पर हर्ष की ऐसी लाली हफ़्तों से न दिखी थी, जैसे कोई बालक तमाशा देखकर मगन हो रहा हो। बीमारी के बाद हम बच्चों की तरह ज़िद्दी, उतने ही आतुर, उतने ही सरल हो जाते हैं। जिन किताबों में कभी मन न लगा हो ; वह बीमारी के बाद पढी जाती है। वसुधा जैसे उल्लास की गोद में खेलने लगी। चोतों को खालें थी, बाघों की, मृगों की, शेरों। वसुधा हरेक खाल को नई उमग से देखती, जैसे बायस्केप के एक चित्र के बाद दूसरा चित्र भा रहा हो। कुंअर साहब एक-एक तोहफ़े का इतिहास सुनाने लगे। यह जानवर कैसे मारा गया, उ के मारने में क्या-क्या बाधाएँ पड़ी, क्या-क्या उपाय करने पड़े, पहले कहाँ गोली लगी, आदि। वसुधा हरेक की कथा आँखे फाड़-फ्राइकर सुन रही थी। इतना सजीव, स्फूर्तिमय आनन्द उसे आज तक किसी कविता, संगीत या आमोद में भी न मिला था। सबसे सुन्दर एक सिंह की खाल थी। वही उसने छोटी।

कुँअर साइब की यह सबसे बहुमूल्य वस्तु थी। इसे अपने कमरे में लटकाने को रखे हुए थे। बोले --- तुम बाधग्वरों में से कोई ले लो। यह तो कोई अच्छी चीज़, नहीं।

वसुधा ने खाल को अपनी ओर खींचकर कहा --- रहने दीजिए अपनी सलाह। मैं खराब ही लूंगी।

कुँअर साहब ने जैसे अपनी आँखों से आंसू पोंछकर कहा --- तुम वही ले लो,. मैं तो तुम्हारे स्खयाल से कह रहा था। मैं फिर वैसा ही मार लूंगा।

'तो तुम मुझे चकमा क्यों देते थे?'

'चकमा कौन देता था ?