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मानसरोवर

'अच्छा खाओ मेरे सिर को क्रसम, कि यह सबसे सुन्दर खाल नहीं है ?'

कुँअर साहब ने हार की हंसी हँसकर कहा --- कसम क्यों खायें, इस एक खाल के लिए ! ऐसी-ऐसी एक लान खालें हो, तो तुम्हारे ऊपर न्योछावर कर दूं।

जब शिकारी सब खालें लेकर चला गया, तो कुँअर साहब ने कहा --- मैं खाल पर काले ऊन से अपना समर्पण लिखूंगा।

वसुधा ने थकन से पलंग पर लेटते हुए कहा --- अब मैं भी शिकार खेलने चलूंगी।

फिर वह सोचने लगी, वह भो कोई शेर मारेगी और उसकी खाल पतिदेव को भेंट करेगी। उस पर लाल जन से लिखा जायया-प्रियतम !

जिस ज्योति के मन्द पड़ जाने से हरेक व्यापार, हरेक व्यंजन पर अन्धकार-सा -हा गया था, वह ज्योति अब प्रदप्त होने लगी थी।

( ५ )

शिकारों का वृत्तान्त सुनने की वसुधा को चाट सो पड़ गई; कुंअर साहब को कई कई बार अपने अनुभव सुनाने पड़े। उसका सुनने से जी ही न भरता था। अब तक कुअर साहब का ससार मला था, जिसके दुःख-सुख, हानि-लाभ, आशा-निराशा, से वसुधा को सरोकार न था। वसुधा को इस ससार के व्यापार से कोई रुचि न थी। बल्कि अरुचि थी। कुँअर साहब इस पृथक् स सार की बातें उससे छिपाते थे; पर अब वसुधा उनके इस संसार में एक उज्जवल प्रकाश, एक वरदानोवाली देवी के समान अवतरित हो गई थी।

एक दिन वसुधा ने आग्रह किया --- मुझे बन्दूक चलाना सिखा दो।

डाक्टर साहब को अनुमति मिलने में विलम्ब न हुआ। वसुधा स्वस्थ हो गई थी। कुँअर साहा ने शुभ मुहूर्त में उसे दीक्षा दी। उस दिन से जब देखा वृक्षों को छह में खड़ी निशाने का अभ्यास कर रही है और 'कुअर साहब खड़े उसको परीक्षा।

जिस दिन उसने पहली चिड़िया मारी, कुँअर साहब हर्ष से उछल पड़े। नौकरों को इनाम दिये गये ; ब्राह्मणों को दान दिया गया है, इस आनन्द को शुभ स्मृति में उस पक्षी की ममी बनाकर रखी गई।

वसुधा के जीवन में अब एक नया उत्साह, एक नया उल्लास, एक नई आशा थी।