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मानसरोवर

पत्ते खड़खड़ा उठे। वसुधा चौंकर पति के कन्धों से लिपट गई। कुअर साहा ने उसकी गर्दन में हाथ डालकर कहा- दिल मजबूत करो प्रिये। बसुधा ने लजित होकर कहा --- नहीं-नहीं, मैं डरती नहीं जरा चौंक पड़ी थी।

सहसा भैंसे के पास दो चिनगारिया-सी चमक उठी। कुँअर साहब ने धीरे से वसुधा का हाथ दबाकर शेर के आने की सूचना दी और सतर्क हो गये। जब शेर भैसे पर आ गया, तो उन्होंने निशाना मारा। खाली गया। दूसरा फैर किया। चीता जख्मी तो हुआ ; पर गिरा नहीं। क्रोध से पागल होकर इतने जोर से गरजा कि बसुधा का कलेजा दहल उठा। कुंअर साहब तीसरा पैर करने जा रहे थे कि चीने ने मचान पर जस्त मारी। उसके अगले पंजों के धक्के से मचान ऐसा हिला कि कुँअर साहब हाथ में बन्दुक लिये झोंके से नीचे गिर पड़े। कितना भीषण अवसर था ! अगर एक पल का भी विलम्ब होता. तो कुँअर साहब की खैरियत न थी। शेर को जलती हुई आँखें वसुधा के सामने चमक रही थीं। उसको दुर्गन्धमय सांस देह में लग रही थी। हाथ- पाव फुले हुए थे ! आत भीतर को सिकुड़ी जा रही थी ; पर इस खतरे ने जैसे उसकी नाड़ियों में बिजली भर दी। उसने अपनी बन्दुक सँभाली। शेर के और उसके बीच में दो हाथ से ज्यादा अन्तर न था। वह उचककर आया ही चाहता था कि वसुधा ने बन्दुक को नली उसको आँखों में डालकर बन्दुक छोड़ी। धाय ! शेर के पजे ढीले पड़े । नीचे गिर पड़ा। अब समस्या और भीषण थी। शेर से तोन हो चार कदम पर कुँअर साहब गिरे थे। शायद चोट ज्यादा आई हो। शेर में अगर अभी दम है, तो वह उन पर कहर बार करेगा। वसुधा के प्राण आँखों में थे और कला- इयों में। इस वक कोई उसकी देह में भाला भी चुभा देता, तो उसे खबर न होती। वह अपने होश में न थी। उसको मूर्छा ही चेतना का काम कर रही थी। उसने बिजली की बत्ती जलाई। देखा शेर उठने की चेष्टा कर रहा है। दूसरी गोली खिर पर मारी और उसके साथ ही रिवाल्वर लिये नीचे कूदी। शेर ज़ोर से गुर्राया। वसुधा ने उसके मुंह के सामने रिवाल्वर खाली कर दिया। कुँअर साहब सँभलकर सहे हो गये। दौड़कर उसे छाती से चिपटा लिया। अरे ! यह क्या ! वसुधा बेहोश यो। भय उसके प्राणों को मुठी में लिये उसकी भात्म-रक्षा कर रहा था। भय के शान्त होते ही मूर्च्छा आ गई।