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मानसरोवर


कुल दो ने पैसे बच रहे हैं। तो वैसे हामिद की जेव में, पाँच अमोना के चटके में। यही तो विसात है और ईद का त्यौहार, अल्लाह ही बेड़ा पार लगाये। धोबन, और नाइन और मेहतरानी और चूड़िहारन सभी तो आयेंगी। सभी को सेवैया चाहिए और थोड़ा किसी को अरिदों नहीं लगता। किस-किस से मुंह चुरायेगी। और मुंह क्यों चुराये ? साल-भर का त्यौहार है। जिन्दगी खैरियत से रहे उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को खुदा सलामत रखे, ये दिन भी कट जायेंगे।

गाँव से मेला चला। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब-के-सब दौड़कर आगे निक्षल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथवालों का इन्तजार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं। हामिद के पैर में तो जैसे पर लग गये हैं। वह कभी थक सकता है। शहर का दोसन आ गया सड़क के दोनों ओर अमरों के बचे हैं। पक्को चार-दोवारी बनी हुई है। पेड़ों में आम और लीचियाँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़की ककड़ी उठाकर आम पर निशाना। लगता है। सालीं अन्दर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक फल। पर हैं। खूब हँस रहे हैं। माली को कैसा उल्लू बनाया है।

बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगी। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लबघर है। इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे सव लड़के नहीं हैं जी। बड़े-बड़े आदमी हैं, सच ! उनकी बड़ी-बड़ी मूंछे हैं। इतने बड़े हो गये, अभी तक पढते जाते हैं। न जाने कृष तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर। हामिद कै मदरसे में दो तीन बड़ेबड़े लड़के हैं, चिलकुल तीन कौड़ो के, रोज मार खाते हैं, काम से जी चुरानेवाले। इस जगह को उसी तरह के लोग होंगे और क्या। क्लधर में जादू होता है। सुना है, यहाँ मुरदे की खोपड़ियाँ दौड़ती हैं। और बड़े-बड़े तमाशे होते हैं, पर किसी को अन्दर नहीं जाने देते है और यहाँ शाम को साइन लीग खेलते हैं। बड़-बड़े आदमी खेलते हैं, मूछों-डाढ़ वाले। और मेमें भी खेलती हैं। सच ! हमारी अम्माँ को वह दे दो, क्या नाम है, वट, तो उसे पकड़ ही न सके। घुमाते ही लुढक जायँ।

महमूद ने कहा---हमारी अम्मीजान को तो हाथ कांपने गे, अल्ला कसम।

मोहसिन बौला --- चलो, मनों आटा पीस डालती हैं। ज़रा-सा बैट पकड़ लेंगी, तो हाथ काँपने लगेंगे। सैकड़ों घड़े पानी रोज़ निकालती हैं। पाँच धड़े तो तेरी भैस पी नाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े तो आँखों तले अँधेरा आ जाय।