पृष्ठ:मानसरोवर १.pdf/५

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और उपन्यास का उदय हुआ, जो कथा और ड्रामा के बीच की वस्तु है। पुराने दृष्टान्त भी रूपान्तरित होकर गल्प बन गये।

मगर सौ वर्ष पहले यूरोप भी इस कला से अनभिज्ञ था। बड़े-बड़े उच्चकोटि के दार्शनिक तथा ऐतिहासिक या सामाजिक उपन्यास लिखे जाते थे ; लेकिन छोटी कहानियों की ओर किसी का ध्यान न जाता था। हाँ, परियों और भूत की कहानियाँ लिखी जाती थी ; किन्तु इसी एक शताब्दी के अन्दर, या उससे भी कम समझिए, छौटौ छहानिर्यों ने साहित्य के और सभी अंग पर विजय प्राप्त कर ली है, और यह कहना गलत न होगा कि जैसे किसी जमाने में कवित्त ही साहित्यिक अभिव्यक्ति का व्यापक रूप था, वैसे ही आज कहानी है। और उसे यह गौरव प्राप्त हुआ है। यूरोप के कितने ही महान् कलाकारों की प्रतिभा से, जिनमें वालज़क, मोपास, घेखाफ, टालस्टाय, मैधिसम गोर्की आदि मुख्य हैं। हिन्दी में तो पच्चीस-तीस साल पहले तक गल्प का जन्म न हुआ था। आज तो कोई ऐसी पत्रिका नहीं, जिसमें दो-चार कहानियाँ न हाँ, यहाँ तक कि कई पत्रिकाओं में केवल कहानियाँ ही दी जाती हैं।

'कहानियों के इस प्राबल्य का मुख्य कारण आजकल का जीवन-संग्राम और समयाभाव है, अब वह ज़माना नहीं रहा, कि हम ‘दोस्तानेख़याल’ लेकर बैठ जायें और सारे दिन उसी के कुञ्जों में विचरते रहें। अब तो हम सुग्राम में इतने तन्मय हो गये हैं कि हमें मनोरजन के लिए समय नहीं मिलता ; अगर कुछ मनोरजन स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य न होता, और हम विक्षिप्त हुए बिना अट्ठारह घण्टे काम कर सकते, तो शायद हा मनोरजन का नाम भी न लेते; लेकिन प्रकृति ने हमें विवश कर दिया है । इसलिए हम चाहते हैं कि थोड़े-से-थोड़े समय में अधिक-से-अधिक मनोरंजन हो जायें; इसीलिए सिनेमागृहों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जाती है। जिसे उपन्यास के पढ़ने में महीनें लगते, उसको आनन्द हम दो घण्टे में उठा लेते हैं। कहानी के लिए पन्द्रह-बीस मिनट ही काफी है; अतएव हम कहानी ऐसी चाहते हैं कि वह थोड़े-से-थोड़े शब्दों में कहीं जाय, उसमें एक वाक्य, एक शब्द भी अनावश्यक न आने पाये, उसका पहला ही वाक्य मन को आकर्षित कर ले और अन्त तक उसे मुग्ध किये रहे, उसमें कुछ चटपटापन हो, कुछ विकास हो, और इसके साथ ही कुछ तत्व भी हो। तत्त्व-हीन कहानी से चाहे मनोरजन भले हो जाय,