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पृष्ठ:मिश्रबंधु-विनोद २.pdf/१५६

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मिश्यन्धुवाद। [१० ११५० | विदरग्य–इनर्क पति से राज्ञा युद्धसिंह के साथ वायुल ज्ञान वाले हैं, तब इन्होंने निम्न छन् उनके पास लिने भेजा पा, जिस पर रच राज्ञा है। इनका फाइल जना घन्छ कर दिया । इन फाय साधारण थे । फज है। मता यह ज्ञान ही कि, मैनाथ पाय पति संगही रहा अभंग जैसे गिरा। पते १ विलन के उत्तर गमन की कैसे ६ निटत जा वियाग विधि सिर । अब जरूर अरज किंप ही बने । चेङ हुज़ जानि फरमायई वि फिर जा । हैं। मैं तुम स्वामी आनु फुटक उलंचि जैहै। पाती माहिँ कैसे लिखें मिश्च मौर मिरजा ॥ नाम-(५३८) पृथीसह दीवान ( रसनिधि)। अन्य नजारा { २८०० दाई देखे ), पद व फुट कविता। समय-१७६१] पिपर--थे दवया राज्य के अन्तर्गत जागीरदार थे। इस कविता प्रशसनीय हैं। इन गणना पद्माकर की ४६ में की जाती हैं। उदाहरण । रतनधि मेाहन दुरस के नैन बरे पल पदि। . ' कहा ” छिन पगम प्र प्रागै सके न ६रि ॥