पृष्ठ:योगवासिष्ठ भाषा (दूसरा भाग).pdf/१६३

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(१० ४४ ) योगवासिष्ठ । हौं, अशिविषे प्रकाशशक्ति, आकाशविषे शब्दशक्ति मैं हौं, अपर तुझको क्या कहौं, कि यह मैं हौं, सर्वात्मा सर्वका आत्मा मैं हौं, झुझते इतर कछु नहीं ॥ हे पांडव ! यह जो सृष्टि प्रवर्त्तती है, उत्पन्न अरु प्रलय होती दृष्ट आती है, सो मेरेविषे ऐसे हैं, जैसे समुद्रविषे तरंग उपजते अरु लीन होते हैं, जैसे पहाड़ पत्थररूप हैं, अरु वृक्ष काष्ठरूप हैं, तरंग जल- रूप है, तैसे सर्व पदार्थविषे मैं आत्मरूप हौं, जो सर्व भूतोंको आत्मा- विषे देखता हैं, सो आत्माको अकर्ता देखता है, जैसे समुद्रविषे नाना- प्रकारके तरंग भासते हैं, स्वर्णविष भुषण भासते हैं, तैसे नाना आकार यह आत्माविर्षे भासते हैं । हे अर्जुन ! यह नानाप्रकारके पदार्थ ब्रह्म- रूप हैं, ब्रह्मते भिन्न कछु नहीं, तब अपर क्या कहिये, भाव विकार क्या कहिये, जगत् द्वैत क्या कहिये, जो वही है, तब वृथा मोहित क्यों होता है ? इसप्रकार बुद्धिमान सुनिकरि समुझसों अंतर भावना निश्चित होकर जीवन्मुक्त इस लोकविषे समरस चित्त विचरते हैं ॥ हे अर्जुन ! तिस पदको तू क्यों नहीं प्राप्त होता, जो पुरुष निर्मान अरु निर्मोह • हुए हैं, अरु अभिलाषादोष जिनका निवृत्त भया है, सर्व कामनाते रहित हुए हैं, सो अव्यय पदको प्राप्त हुए हैं ॥ इति श्रीयोगवासिष्ठे निव- णप्रकरणे अर्जुनोपदेश वर्णने नाम द्विपंचाशत्तमः सर्गः ॥ २२ ॥ त्रिपंचाशत्तमः सर्गः ५३. अर्जुनोपदेशे सर्वब्रह्मप्रतिपादनम् । श्रीभगवानुवाच ॥ हे महाबाहो ! बहुरि मेरे परमवचन सुन, मैं तेरी प्रसन्नता के निमित्त कहता हौं, जो तेरा हितकारी हौं, यह जो उष्ण शीत विषय हैं, सो इंद्रियको स्पर्श होते हैं, अरु आगमापायी हैं, आते हैं, बहुरि निवृत्त हो जाते हैं, ताते अनित्य हैं, तिनको तू सहि रहूं, आत्माको स्पर्श नहीं करते, तू तौ आत्मा है, एक है, आदि अंत मध्यते रहित है, निराकार अखंड पूर्ण है, तुझको शीत उष्ण सुखदुःख खंडित नहीं कर सकते, यह कलनाकार रचे हुए हैं, जैसे स्वर्णविवे