पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/१३९

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भैरो-"आपका कुत्ता आपको थोड़े ही काटता है, आप तो उसकी पीठ सुहलाते हैं; पर जिन्हें काटने दौड़ता है, वे तो उसे इतना सीधा न समझेंगे।"

इतने में भैरो की दूकान आ गई। गाहक उसकी राह देख रहे थे। वह अपनी दूकान में चला गया। तब प्रभु सेवक ने ताहिरअली से कहा-"आप कहते हैं, सारा मुहल्ला मिलकर मुझे मारने आया था। मुझे इस पर विश्वास नहीं आता। जहाँ लोगों में इतना वैर-विरोध है, वहाँ इतना एका होना असंभव है। दो आदमी मिले, दोनों एक- दूसरे के दुश्मन। अगर आपकी जगह कोई दूसरा आदमी होता, तो इस वैमनस्य से मन-माना फायदा उठाता। उन्हें आपस में लड़ाकर दूर से तमाशा देखता। मुझे तो इन आदमियों पर क्रोध के बदले दया आती है।"

बजरंगी का घर मिला। तीसरा पहर हो गया था। वह भैंसों की नाँद में पानी डाल रहा था। फिटन पर ताहिरअली के साथ प्रभु सेवक को बैठे देखा, तो समझ गया- “मियाँजी अपने मालिक को लेकर रोब जमाने आये हैं; जानते हैं, इस तरह मैं दब जाऊँगा; साहब अमीर होंगे, अपने घर के होंगे; मुझे कायल कर दें, तो अभी जो जुरमाना लगा दें, वह देने को तैयार हूँ; लेकिन जब मेरा कोई कसूर नहीं, कसूर सोलहों आने मियाँ हो का है; तो मैं क्यों देखूँ? न्याय से दबा लें, पद से दबा लें, लेकिन भबकी से दबनेवाले कोई और होंगे।”

ताहिरअली ने इशारा किया, यही बजरंगी है। प्रभु सेवक ने बनावटी ऋध धारण करके कहा—"क्यों बे, कल के हंगामे में तू भी शरीक था?"

बजरंगी—"शरीक किसके साथ था? मैं अकेला था।"

प्रभु सेवक—"तेरे साथ सूरदास और मुहल्ले के और लोग न थे? झूठ बोलता है!"

बजरंगी—झूठ नहीं बोलता, किसी का दबैल नहीं हूँ। मेरे साथ न सूरदास था और न मोहल्ले का कोई दूसरा आदमी। मैं अकेला था।"

घीसू ने हाँक लगाई—"पादड़ी! पादड़ी!"

मिठुआ बोला—“पादड़ी आया, पादड़ी आया!”

दोनों अपने हमजोलियों को यह आनंद-समाचार सुनाने दौड़े, पादड़ी गायेगा, तसवीरें दिखायेगा, किताबें देगा मिठाइयाँ और पैसे बाँटेगा। लड़को ने सुना, तो वे भी इस लूट का माल बँटाने दौड़े। एक क्षण में वहाँ बीसों बालक जमा हो गये। शहर के दूरवर्ती मुहल्लों में अँगरेजी वस्त्रधारी पुरुष पादड़ी का पर्याय है। नायकराम भंग पीकर बैठे थे, पादड़ी का नाम सुनते ही उठे, उनकी बेसुरी तानों में उन्हें विशेष आनंद मिलता था। ठाकुरदीन ने भी दूकान छोड़ दी, उन्हें पादड़ियों से धार्मिक वाद-विवाद करने की लत थी, अपना धर्मज्ञान प्रकट करने के ऐसे सुंदर अवसर पाकर न छोड़ते थे। दयागिर भी आ पहुँचे। पर जब लोग फिटन के पास पहुँचे, तो भेद खुला। प्रभु सेवक बजरंगी से कह रहे थे-"तुम्हारी शामत न आये, नहीं तो साहब तुम्हें तबाह कर देंगे। किसी काम के न रहोगे। तुम्हारी इतनी मजाल!"