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रंगभूमि

बजरंगी—"पंडाजी के हजारों जात्रो आते हैं, वे इसी मैदान में ठहरते हैं। दस-दस, बीस-बीस दिन पड़े रहते हैं, वहीं खाना बनाते हैं, वहीं सोते भी हैं। सहर के धरमसालों में देहात के लोगों को आराम कहाँ। यह जमीन न रहे, तो कोई जात्री यहाँ झाँकने भी न आये।"

जॉन सेवक—"जात्रियों के लिए, सड़क के किनारे, खपरैल के मकान बनवा दिये जाय, तो कैसा?"

बजरंगी—"इतने मकान कौन बनवायेगा?"

जॉन सेवक—"इसका मेरा जिम्मा। मैं वचन देता हूँ कि यहाँ धर्मशाला बनवा दूँगा।"

बजरंगी—"मेरी और मुहल्ले के आदमियों को गाय-भैसे कहाँ चरेंगी?"

जॉन सेवक—"अहाते में घास चराने का तुम्हें अख्तियार रहेगा। फिर, अभी तुम्हें अपना सारा दूध लेकर शहर जाना पड़ता है; हलवाई तुमसे दूध लेकर मलाई, मक्खन, दही बनाता है, और तुमसे कहीं ज्यादा सुखी है। यह नफा उसे तुम्हारे ही दूध से तो होता है! तुम अभी यहाँ मलाई मक्खन बनाओ, तो लेगा कौन? जब यहाँ कारखाना खुल जायगा, तो हजारों आदमियों की बस्ती हो जायगी, तुम दूध की मलाई बेचोगे, दूध अलग बिकेगा। इस तरह तुम्हें दोहरा नफा होगा। तुम्हारे उपले घर बैठे बिक जायँगे। तुम्हें तो कारखाना खुलने से सब नफा-ही-नफा है।”

नायकराम—"आता है समझ में न बजरंगी?"

बजरंगी—"समझ में क्यों नहीं आता, लेकिन एक मैं दूध की मलाई बना लूँगा, और लोग भी तो हैं, दूध खाने के लिए जानवर पाले हुए हैं। उन्हें तो मुमकिल पड़ेगी?"

ठाकुरदीन—"मेरी ही एक गाय है। चोरों का बस चलता, तो इसे भी ले गये होते। दिन-भर वह चरती है। साँझ-सबेरे दूध दुहकर छोड़ देता हूँ। केले का भी चारा नहीं लेना पड़ता। तब तो आठ आने रोज का भूसा भी पूरा न पड़ेगा।"

जॉन सेवक—"तुम्हारी पान की दुकान है न? अभी तुम दस-बारह आने पैसे कमाते होगे। तब तुम्हारी बिक्री चौगुनी हो जायगी। इधर की कमी उधर पूरी हो जायगी। मजदूरों को पैसे की पकड़ नहीं होती; काम से जरा फुरसत मिली कि कोई पान पर गिरा, कोई सिगरेट पर दौड़ा। खोंचेबाले की खासी विक्री होगी, और शराब-ताड़ी का तो पूछना ही क्या, चाहें तो पानी को शराब बनाकर बेचो। गाड़ीवालों की मजदूरी बढ़ जायगी। यही मोहल्ला चौक की भाँति गुलजार हो जायगा। अभी तुम्हारे लड़के शहर पढ़ने जाते हैं, तब यहीं मदरसा खुल जायगा।"

जगधर—"क्या यहाँ मदरसा भी खुलेगा?"

जॉन सेवक—"हाँ, कारखाने के आदमियों के लड़के आखिर पढ़ने कहाँ जायँगे? अँगरेजी भी पढ़ाई जायगी।"

जगधर—"फीम कुछ कम ली जायगी?"