पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/१५९

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रंगभूमि


बनाना चाहती हूँ। आज वह किसी की रक्षा के निमित्त अपने प्राण दे दे, तो मुझसे अधिक भाग्यवती माता संसार में न होगी। तुम मेरे इस स्वर्ण-स्वप्न को विच्छिन्न कर रही हो। मैं तुमसे सत्य कहती हूँ सोफी, अगर तुम्हारे उपकार के बोझ से दबी न होती, तो तुम्हें इस दशा में विष देकर मार्ग से हट देना अपना कर्तव्य समझती। मैं राजपूतनी हूँ, मरना भी जानती हूँ और मारना भी जानती हूँ। इसके पहले कि तुम्हें विनय से पत्र- व्यवहार करते देखूँ, मैं तुम्हारा गला घोट दूँगी। तुमसे भिक्षा माँगती हूँ, विनय को अपने प्रेम-पाश में फँसाने की चेष्टा न करो; नहीं तो इसका फल बुरा होगा। तुम्हें ईश्वर ने बुद्धि दी है, विवेक दिया है। विवेक से काम लो। मेरे कुल का सर्वनाश न करो।"

सोफी ने रोते हुए कहा— "मुझे आज्ञा दीजिए, आज चली जाऊँ।" रानी कुछ नर्म होकर बोलीं-मैं तुम्हें जाने को नहीं कहतो। तुम मेरे सिर और आँखों पर रहो, (लजित होकर) मेरे मुँह से इस समय जो कटु शब्द निकाले हैं, उनके लिए क्षमा करो। वृद्धावस्था बड़ी अविनयशील होती है। यह तुम्हारा घर है। शौक से रहो। विनय अब शायद फिर न आयेगा। हाँ, वह शेर का सामना कर सकता है; पर मेरे क्रोध का सामना नहीं कर सकता। वह वन वन की पत्तियाँ तोड़ेगा; पर घर न आयेगा। अगर तुम्हें उससे प्रेम है, तो अपने को उसके हित के लिए बलिदान करने को तैयार हो जाओ। अब उसकी जीवन-रक्षा का केवल एक ही उपाय है। जानती हो, वह क्या है?"

सोफ़ी ने सिर हिलाकर कहा—"नहीं।"

रानी—"जानना चाहती हो?"

सोफी ने सिर हिलाकर कहा—"हाँ।”

रानी—"आत्मसमर्पण के लिए तैयार हो?”

सोफी ने फिर सिर हिलाकर कहा—"हाँ।"

रानी—"तो तुम किसी सुयोग्य पुरुष से विवाह कर लो। विनय को दिखा दो कि तुम उसे भूल गई, तुम्हें उसकी चिंता नहीं है। यही नैराश्य उसको बचा सकता है। हो सकता है कि यह नैराश्य उसे जीवन से विरक्त कर दे, वह ज्ञान-लाभ का आश्रय ले, जो नैराश्य का एकमात्र शरणस्थल है, पर संभावना होने पर भी इस उपाय के सिवा दूसरा अवलंब नहीं है। स्वीकार करती हो?”

सोफी रानी के पैरों पर गिर पड़ी और रोतो हुई बोली---"उनके हित के लिए......कर सकती हूँ"

रानी ने सोफी को उठाकर गले लगा लिया और करुण स्वर में बोलीं-मैं जानती हूँ, तुम उसके लिए सब कुछ कर सकती हो। ईश्वर तुम्हें इस प्रतिज्ञा को पूरा करने का बल प्रदान करें।"

यह कहकर जाह्नवी वहाँ से चली गई। सोफी एक कोच पर बैठ गई और दोनों हाथों से मुँह छिपाकर फूट-फूटकर ने लगी। उसका रोम-रोम ग्लानि से पीड़ित हो रहा