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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/१०८

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अथ द्वितीय गर्भा । स्थान केसरबाग | [ द्वितीय ( बीचमें एक सरोवर हैं ) उसके किनारे रणधीर, रिपुदमन, सोमदत्त, नाथूराम, मुलवासीलाल कुर्सियोंपर बैठे हैं, जीवन रणधीरसिंहकी कुर्सी के पीछे खड़ा है। रणधीर --- देखो, वृक्षोंने नई नई कोंपल आने लगीं। इनके देखने मात्र बसन्तका आरम्भ जाना जाता है। रिपुदमन --- जैसे इन वृक्षोंके फूलनेसे वसन्त ऋतु जानी जाती है, वैसे ही मनुष्यकी बुद्धिसे उसका होनहार भी मालूम हो जाता है । मुखवासीलाल- बेशक, अवसे वारिशके आसार पाए जाते हैं, और गुलके बाद समर आता है । रणधीर -- देखो, इस सरोवर के निर्मल जलमें रह रहके कमलोंकी झांई कैसी सुन्दर दिखाई देती है । चौबेनी - ( जल्दी जल्दी आकर सोमदत्तसे) आज हमें कौनसो चन्द्रमा है ? रणधीर क्यों, क्या हुआ ? चौबेजी --- ( बैठकर ) भयोका, मेरो माथी ! मैंने पहले बहुत से पेड़नसों छत्ता तोर तोरके सहत खायो हो, वाही लालचसे आजहु एक पेड़ चढ़ गयी पर न जाने