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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/११२

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४४ रणधीर और प्रेममोहिनी । 1 द्वितीय [ सरोजनी वेश्याका प्रवेश ] रणधीर--( मनमें ) ये तो पण्डितजीके प्रश्न मिलानेको आ पहुंची । इस समय मुझको अपने विचारपर दृढ़ रहना चाहिये । नाथूराम -- ( मनमें ) कांई फूटरो रूप छे ! सुखवासीलाल- - ( मनमें) इसको देखते ही ! ( २ ) (२) मेरे जिस्ममें ताजी जान आ गई । ओहो ! आज इसने क्या नफीन पोशाक पहनी है। इसकी पुरपेंच जुतर्फे दिलको बेताच किए डालती हैं, मगर ऐसा न हो । वेहोशीकी हालतमें कहीं मेरी जुबान से कोई रात्री ( द ) वात न निकल जाय । सरोजनी --- ( मन ) मैं दूसरे के कहने से यहां आई हूँ । परन्तु इस गवत जानको देखकर तो मेरा मन आपसे आप इसके आधीन हुआ जाता है । रणधीरने लज्जित होकर ) राजकुमार- ( प्रकट में रणधीर सुन्दरी ! तुमको कहना हो सो दर छोड़कर कह दो, परन्तु मेरा स्वभाव तो तुमने सुना होगा । सरोजनी में कुछ धन दौलत नहीं चाहती। मैं तो बहुत दिनसे आप-प- 1 ( आंख नीची कर ली । । रणधीर --- ( मनमें) ये इन लोगोंके फुसलानेका ज्ञ है। (प्रकट) नहीं ऐसी बातोंकी चर्चा यहां मत करो। मैं अपना स्वभाव तुमको पहले जता चुका हूं । सरोजनी -- ( मनमें ) अब दवाकर कहने से जिद बढ़ेगी । ( प्रकट में पहले बचनको पूरा करती हुई ) मैं बहुत दिनसे आपको अपना गुण दिखाया चाहती हूं। सुखवासीलाल -- (मनमें) नए पंछीको जाल में फंसानेके वास्ते इसने खूब ल्हासा लगाया । (१) कैसा सुन्दर रूप है ।