Ye रणधीर और प्रेममोहिनी । [ द्वितीय पतिसेवाका बड़ा धर्म था सो मेरे हाथ न रहा । जिस कामसे मेरी जीचिका हुई, इसमें कोई सज्जन मन रंजन मुझको न मिला और देवयोगसे दशहराके नीलकी भांत एक दिखाई भी दिया तो उसका मिलाप कठिन हो गया। मैंने अपनी लाज छोड़कर अपने मुखसे कहा तो भी उसने कुछ न सुना । हाय ! दुःखियाको सब जगह दुःख है ! चौवजी - (भोले भाव से) नीलकण्ठके लिए इत्ती फिकर मत करो। देखो, मैंने बड़ी कठनाई से एक पिंटुकिया पकरीही सोहू दो तीन दिन रहकै आपते आप उड़ गई । अपनको पच्छी पखेरूते लहनो नांय हैं । (५) ( सब हंसने लगे । ) रणवीर--- (मनन) वेश्याकी बातका भरोसा न करना चाहिये पर इसके मनमें कुछ न कुछ दर्द तो पाया जाता है । (प्रकट) ऐसी बातोंमें कुछ सार नहीं। आंसू डालकर धिक्कार सहना दुर्लभ चीजके लालचंसे दुर्लभ देहको जोखोंमें डालना, तीस रात जग कर पलभरका सुख भोगना, जिसमें भी मिलाप हुआ तो थोथा लाभ, न मिलाप हुआ तो थोथी महनत । बुद्धि बेचकर मूर्खता खरीदनी, अथवा मूर्खताक आगे बुद्धिस पानी भराना, ऐसी प्रीतिका फल है । सुखवासीलाल --- हजुर, इन जरा जरासी वातोंपर इतना माम्मुल करेंगे तो काम क्यों कर चलेगा ? (२) रणधीर - दोष छोटे से छोटा और गुप्तसे गुप्त बनकर मनमें प्रवेश करता है परन्तु प्रवेश पीछे दृढ़ हो जाता है इस कारण इसको कभी छोटा न गिनना चाहिये । (१) (भोले भावसे) नीलकण्टके लिए इतना फिक्र मत करो। देखो, मैंने बड़ी कठिनताले एक गुरसल पकड़ी थी सो भी दो तीन दिन रहकर आपसे आप उड गई । अपनेको पक्षी, पखेरूओंसे लहना ही नहीं है (२) प्रभु, इन जरा जरासी वातोंमें इतना विचार करेंगे तो काम कैसे चलेगा।
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