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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/१२३

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गर्भाङ्क ] द्वितीय अंक । ५५ www. दूधकी तरह उनका पता नहीं लगता । इस कारण आपसे बुद्धिमानोंको वो चञ्चलता दर हुए पीछे अपने हानि लाभका विचार करना चाहिये । आप इस समय इस वातको पी जाओ, सबके आए पीछे अचानक उनके अंगरखेको देखकर निश्चय कर लेंगे । ( दोनों कुर्सियों पर बैठ गए 1 ) सोमदत्त --- ( मनमें ) जो मैं उस समय इनको पापी समझ कर चला जाता तो करना चाहिये । ( आगे बढ़, कर कैसी भूल होती ? मनुष्यको सब काम विचार कर प्रकट ) महाराज अवतक और लोग नहीं आए ? ( सोमदत्त बैठ गया ) भलेन्हाए । रणधीर - - ( उदास भावसे ) आते होंगे । चौबजी - ( झूमते झूमते आकर मननें) आज तो - भांगके जोरसे जासमें सरीर सन्न तन कर रह्यो है। चलो सरोवर में लहुआ निधानके पास चलके भोजनकी ठैरादें । का मोए भोजनके लिये कोऊ टेरे है ? अच्छी आयो । ( रणधीर के पास जाकर ) धरम्मूरत मैं तो आवैई हो । ( १ ) रणधीर - (अचिते) बैठ जाओ । चौबेजी - ( भोजनकी आज्ञा समझकर ) पातर कहां है । रिपुदान - ( पातरका अर्थ वेश्या समझकर ) आपका अबतक जी नहीं भरा चौबेजी— कोरी वातनते जी भरत होइगो ? रिपुदमन --तो उसका क्या करोगे ? चौबेजी - जो सब करत हैं । ( बैठ गये ) ( १ ) झूमते झूमते आकर, (मनमें ) आज तो ताला में अच्छे नहाए । भङ्गके जोरसे इस समय शरीर में सन्नाटा हो रहा है। चलो लडुआनिधनके पास चलकर भोजनकी वैरायें । क्या मुझको भोजनके वास्ते कोई पुकारता है ? अच्छा, आया ? ( रणधीरके पास जाकर ) धर्ममूर्ति में आता ही तो था ।