गर्भाङ्क ] द्वितीय अंक । सोमदत्त - गवैया गिरा तो भी ताल सुरसे । धु सुखवासीलाल- गरीब परवर ! चौबेजीने तालाव में आज बड़े बड़े तमाशे किए | चौबेजी -- और अपनी न कहोगे जो पानी में पाँव धरत हो कमलकी नाळते डर कर निकर भागे ! रणधीर--( रूखे होकर ) क्यों थोथी बातें कहते हो । सुखवासीलाल - ~ ( मनमें ) जिस वक्त आदमीका दिल उच्छाद होता है उस वक्त उसको किसीकी बात अच्छी नहीं लगती । चौबेजी-अच्छी, मैं एक बात और कहऊं, फिर बस्स । ( विचारकर ) बखत पै रांड याद ही नांय आवै । ( मुखबासीलालकी तरफ देखकर ) क्योंजी में का कह्यो चाहे हो ? जाईवे द्यौ, नांय याद आवे तो न सही पर अब भोजन में कित्ती देर है ? ( १ ) रणधीर -- जरा ठैरो ! चौबेजी - भोजन के लिए तो आप कहोगे जित्ती देर ठैरो रहोंगो पर बाते थोरोसो सरोजनी को जरूर दीओ नहिं तो चाकी नजर लग जायगी । ( २ ) रणधीर - ( तेज होकर ) तुमसे नाहीं कर दी तो भी तुम अपनी नहीं छोड़ते । दन्तकथा (१) अच्छा, मैं एक बात और कह लूं फिर दस । ( विचारकर ) समयपर रांड याद ही नहीं आती। ( सुखदासीलाल्की तरफ देखकर ) क्यों जी में क्या कहा चाहता था ? जाने दो नहीं वा आती तो न सही, पर अब भोजनेमें कितनी देर है ? (२) भोजनके वास्ते तो आप कहोगे जिसनी देर टहरा रहूंगा परन्तु उसमें थोड़ासा सरो- जनीको जरूर देना, नहीं तो उसकी नजर लग जायगी ।
पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/१२५
दिखावट