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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/१२९

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गमक ] द्वितीय अंक । हमारे देशमै एक बड़ी लायकीवाला, चाहती है। इस कारण सरोजनीका नाच देखनेसे आज मेरा मन बड़ा उदास हो गया। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि, अन्तमें ही बातें मेरा सुभाव विगाड़ छिपकर काम करनेवाली हो जायंगी। ऐसे मौकोंपर बहुधा मनुष्यका सुभाव इस सैतिसे बदलता है कि उसको अपने सुभाव बदलने की आप खबर नहीं रहती, परन्तु बदले पीछे वो अपनी हाल देखकर आप चकित रह जाता है । सीधा सच्चा आदमी तीनसो रूपये महीनेमें नौकरं हुआ था परन्तु मौकर होते ही खुशामदी उसके पीछे उगे, खर्च बढ़ गया रूपये की जरूरत हुई, तनखासे काम न चलसंका, कर्ज काढने का समय आया, कर्ज उतारनेके लिए रिशवत सिवाच कोई रस्ता न था अत छिरकर रिश्वत ली। रिशवत लेना सावंत हुआ और वो अपनी पहली चालको पिछली चालसे मिलाकर आप चौंक उठा, सब इज्जत धूलमें मिल गई । ~ उस दिन से मैंने सब बातों में अपना स्परूप देखकर हद बांध रखी है और हर घड़ी अपने युभावको जांचता रहता हूं । आमदनी से कम खर्च रखनेकी प्रतिज्ञा है, परन्तु आज सरोजिनीका नाच देखनेसे मेरा मन भङ्ग हो गया । रिपुदमन - (मनमें) रणधीरसिंहका मन दृढ़ करने के लिए ये समयं बहुत अच्छा है । क्योंकि लाख पिगले बिना उसपर मोहर नहीं लगती। ( प्रकट) निसन्देह मनुष्य मा काम, क्रोध, लोभ मोहका सोत रहता है और समय पाकर घो अपना बैग प्रकंद भी करता है । परन्तु ज्ञानी अपने विचारसे उसका वेंग रोक लेते हैं, और अंज्ञान उसके भंवर जालमें पड़कर अपना विचार भूल जाते हैं, ज्ञानीको अपने विचारसे उसका वेग रोकने में कुछ परिश्रम पड़ता है परन्तु अज्ञान उसकी कैटीली धार में पड़कर आप वह जाते हैं। काम, क्रोधका वेग रोकना मनकी मजबूतीके आधीन है और वेग रोकनेकी रुचि उपदेशसे उत्पन्न होती है । रुचि विना मनकी दृढ़ता कुछ काम नहीं आती। इस कारण काम क्रोधका वेग रोकनेके लिए उपदेश मुख्य समझाना