१४ रणधीर और प्रेममोहिनी । [ चतुर्थ उगते हैं और जिन मूर्खेको विम नहीं आती वो विद्यावान बनकर छोटे रुज- गारमें अपनी स्वरूप हामि बताते हैं। जिन छिचोरोंकी तरफ कोई स्त्री प्रीतिते नहीं देखती वो अपने संगीतियोंम पेटकर झूठी बातें बनानेमें अपनी बढ़ाई समझतें हैं, जिन दरिद्रियों के पास धन नहीं होता वे धनवानोंके पास बैठकर झूठी दौलत दिखानका रूपं बनाते हैं। . रणधीर आपकी कहन मेरे मनपर असर करती है और में ये भी जानता हूं कि बहुधा इस तरह की बनावट और चालाक सुवासीलाल सरीने अथकच्चे मनुष्यों से होती हैं। जो लोग बिल्कुल अज्ञान हैं उनको तो ऐसी बातें उपजती ही नहीं ; जो पुरे हैं वें परिणाम सोचकर ऐसी वालोंसे बचते हैं पर अधूरे परिणाम तक तो पहुंचे नहीं सकते और जीविका करने का साहस करते हैं इस कारण उनसे बहुधा ऐसी बनावट और चालाकी होती है परन्तुं सुखवासीलालके अपराधपर हरताल - की तरह वरहेकी मही लग गई । ( हंसकर ) आप मेरे कहनेका कुछ बुरा न मानें जिससे मेरी प्रीति होती है उससे में भीतर, चाहर एक्सां रहता हूं । रिपुदमन ---ये ही बात मेरे मनकी बढ़ानेवाली है, मुझको वह अचरज है कि आपसे बुद्धिमान ऐसी मोटी बातमै धोका खाते हैं पर अपने बचाव के लिए दूसरी चाल नहीं सोचते ! रणधीर ---अच्छा, आपके कहनेसे में फिर उखाड़ पछाड़ करता हूं। सब कांम क्रमसे करने चाहिये । ( पुकार कर ) अरे जीवन यहां आना । ( धीरे रिपुदमन से ) इसपर मुझको बड़ा भरोसा है । रिपुदमन--घर गृहस्थके काम तो ये लोग अक्सर गड़बड़ कर जाते हैं 1 रणधीर - किसी धोकके सब आदमी एकसे नहीं होते !
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