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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/१४०

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७२ रणधीर और प्रेममोहिनी । [ प्रथम. सेनापति--तो लाचार उनको तोड़ना पड़ेगा परन्तु तुमारा रूप देख कर मेरे मनमें दया आती है । रणधीर -- मेरे ऊपर नहीं अपने कुटुम्बपर दया करो । सेनापति तुमसे क्या लड़ें, लड़ाई बराबरवालेसे होती है । रणधीर -- सच कहा, मैं तुम्हारे लिए अपना नौकर बुला दूंगा । सेनापति-अब तुम मेरे आगेसे हट जाओ । रणधीर - अपनी आंखें क्यों नहीं बन्द कर लेते । सेनापति - (खड्ग दिखाकर ) देखो इसकी धार बड़ी तेज है । है रणधीर ----पर तुम्हारे वचनोंसे तो अधिक न होगी । सेनापति--- तुम अभी बालक हो ! रणधीर - तो हम पूतना वधका अनुकरण करेंगे । सेनापति-- (कोसे) मुख सन्हाल कर नहीं बोलते ! रणवीर-हमने क्या झूट कहा ? सेनापति ( पैंतर बदल कर ) अच्छा तो आओ रणवीरने बिना भालेका एक भाला मार कर सेना- पतिको पांच सात गज ऊंचा उछाल दिया | सूरतके महाराज - ( देखकर जल्दी से ) जो वीर इस समय हमारे सेनापतिको बचावेगा वोही आजकी रास विद्यामे जीतनेवाला समझा जायगा । ( सब राजा इधर उधर दौड़े पर किसी से कुछ न हो सका । रणधीरने घोड़े समेत ऊंचे उछल कर सेनापतिको गिरते गिरते रोक लिया और सूरतपतिके आगे लाकर खड़ा कर दिया 1 )